ओलंपिक में भारत के शुरूआती नायकों को मत भूलो, कहा खशाबा जाधव के परिवार ने

By भाषा | Published: July 22, 2021 04:23 PM2021-07-22T16:23:49+5:302021-07-22T16:23:49+5:30

Don't Forget India's Early Heroes In Olympics, Says Khashaba Jadhav's Family | ओलंपिक में भारत के शुरूआती नायकों को मत भूलो, कहा खशाबा जाधव के परिवार ने

ओलंपिक में भारत के शुरूआती नायकों को मत भूलो, कहा खशाबा जाधव के परिवार ने

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(मोना पार्थसारथी)

नयी दिल्ली, 22 जुलाई तोक्यो ओलंपिक में पूरे देश की नजरें जहां भारतीयों के प्रदर्शन पर लगी हैं , वहीं मीलों दूर महाराष्ट्र के सातारा जिले के छोटे से गांव गोलेश्वर में रहने वाला एक परिवार उस दिन का इंतजार कर रहा है जब भारत के पहले ओलंपिक व्यक्तिगत पदक विजेता को उचित सम्मान मिलेगा । यह परिवार है हेलसिंकी ओलंपिक 1952 के कांस्य पदक विजेता पहलवान खशाबा दादासाहेब जाधव का ।

जाधव ने 23 जुलाई 1952 को ही पदक जीता था और शुक्रवार को तोक्यो ओलंपिक के उद्घाटन समारोह के साथ भारत के पहले ओलंपिक व्यक्तिगत पदक की 69वीं वर्षगांठ भी है ।

जाधव ने 1952 में हेलसिंकी ओलंपिक में तमाम कठिनाइयों और आर्थिक अडचनों से पार पाने के बाद कांस्य पदक जीता । वह ओलंपिक की व्यक्तिगत स्पर्धा में पदक जीतने वाले स्वतंत्र भारत के पहले खिलाड़ी थे । अगला व्यक्तिगत पदक 1996 अटलांटा ओलंपिक में टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस ने जीता ।

जाधव के बेटे रंजीत ने भाषा से बातचीत में कहा ,‘‘ यह अच्छी बात है कि खिलाड़ियों को सरकार की ओर से हरसंभव मदद मिल रही है । देश को खेलों की महाशक्ति बनाने के लिये यह जरूरी है । अगर यह सिलसिला जारी रहा तो हम आने वाले समय में काफी पदक जीत सकते हैं ।’’

उन्होंने कहा ,‘‘ इसके साथ ही मैं अपील करना चाहता हूं कि उन पुरोधाओं को नहीं भूलें जिन्होंने भारत के मौजूदा खेल परिदृश्य की नींव रखी । उन्होंने उस समय में भारत को विश्व खेल मानचित्र पर पहचान दिलाई जब हम आजाद ही हुए थे और काफी चुनौतियां सामने थी ।’’

जाधव बेंटमवेट वर्ग फ्रीस्टाइल कुश्ती में कनाडा के एड्रियन पोलिकिन और मैक्सिको के लियोनार्डो बासुर्तो जैसे दिग्गज पहलवानों को हराया था । ओलंपिक में भागीदारी के लिये उनके प्रयासों और वित्तीय कठिनाइयों की कहानी भी किसी से छिपी नहीं है ।

जाधव को अभी तक पद्म सम्मान नहीं मिला है और अर्जुन पुरस्कार की स्थापना के 40 साल बाद उन्हें 2001 में यह सम्मान दिया गया । दिल्ली में 2010 में इंदिरा गांधी खेल परिसर का नाम उनके नाम पर केडी जाधव स्टेडियम रखा गया ।

रंजीत ने कहा ,‘‘ हम चाहते हैं कि उन्हें उचित सम्मान मिले । लेकिन ये चीजें मांगकर हासिल नहीं की जाती । उन्हें जीतेजी ही सम्मान मिल जाना चाहिये था । उनके साथ जीतेजी काफी अन्याय हुआ ।’’

उन्होंने कहा ,‘‘ मुझे याद है जब 1982 में दिल्ली में पहले एशियाई खेल हुए तो उन्हें एक दिन पहले न्यौता भेजा गया । उन्होंने मशाल दौड़ में हिस्सा लिया लेकिन वह मुख्य मशाल भी नहीं जला सके । अर्जुन पुरस्कार भी उन्हें मरणोपरांत मिला । ’’

जाधव का 1984 में एक दुर्घटना में निधन हो गया था ।

रंजीत ने कहा ,‘‘ मैने पूर्व खेलमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़, केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और राकांपा प्रमुख शरद पवार समेत हर बड़े नेता से मुलाकात की लेकिन अभी तक कुछ नहीं हो सका ।’’

उन्होंने कहा ,‘‘ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार जन पद्म पुरस्कारों के लिये नामांकन मांगे हैं तो हमें उम्मीद है कि ओलंपिक वर्ष में शायद खशाबा दादासाहेब जाधव को वह सम्मान मिल जाये जिसके वह हकदार है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

Web Title: Don't Forget India's Early Heroes In Olympics, Says Khashaba Jadhav's Family

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