Protect the bureaucracy(cbi) from political interference | पवन के. वर्मा का ब्लॉग: नौकरशाही को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाएं
पवन के. वर्मा का ब्लॉग: नौकरशाही को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाएं

देश की प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई में सर्वोच्च स्तर पर तमाशा देखने को मिल रहा है। एजेंसी के दो शीर्ष अधिकारी खुले तौर पर एक-दूसरे के साथ युद्धरत थे। आधी रात के नाटक में निदेशक आलोक वर्मा को जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया था और उनके प्रतिद्वंद्वी, विशेष निदेशक अस्थाना के साथ भी यही सलूक किया गया। विगत दस जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने निदेशक आलोक वर्मा को पद पर बहाल किया, लेकिन चौबीस घंटे के भीतर ही उनकी नियुक्ति करने वाली उच्चधिकार  समिति ने 2-1 के निर्णय से वर्मा को हटा दिया। समिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, देश के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस ए।के। सीकरी और संसद में कांग्रेस (सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी) के नेता मल्लिकाजरुन खड़गे का समावेश था, जिसमें खड़गे फैसले के विरोध में थे। अपनी बहाली के 24 घंटे के भीतर ही वर्मा ने दर्जनों अधिकारियों का तबादला कर दिया था। सीबीआई के निदेशक पद से हटा कर वर्मा को सिविल डिफेंस, फायर सर्विसेस और होम गार्ड विभाग का महानिदेशक बना दिया गया, लेकिन वर्मा ने सीबीआई निदेशक पद से हटाए जाने के एक दिन बाद इस्तीफा दे दिया है। एम। नागेश्वर राव को अंतरिम सीबीआई निदेशक बनाया गया है और उन्होंने आलोक वर्मा द्वारा किए गए तबादलों संबंधी फैसले को रद्द कर दिया है।
 
इस अप्रिय तमाशे में, जो पूरी तरह से सार्वजनिक रूप से खेला गया, एक बात स्पष्ट तौर पर उभरी है कि सीबीआई की सार्वजनिक छवि पेंदे में बैठ गई है। एक पूर्व नौकरशाह के रूप में, मेरा मानना है कि किसी भी लोकसेवक को अपनी बेगुनाही साबित करने का अधिकार है और अपुष्ट आरोपों के आधार पर दंडित नहीं किया जाना चाहिए। सरकार चाहे जिसकी हो, यह एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, क्योंकि अगर इसे नजरंदाज किया गया तो राजनीतिक शक्तियां किसी भी आरोप के आधार पर अपनी इच्छानुसार किसी नौकरशाह को हटाने या स्थानांतरित करने के लिए स्वतंत्र हो जाएंगी। 

यह सच है कि इस मामले में,  सीवीसी को आलोक वर्मा के खिलाफ शिकायतें मिलीं और उसने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसके आधार पर उच्चधिकार समिति, जिसने उनकी नियुक्ति की थी, को वर्मा को अग्निशमन सेवाओं के अपेक्षाकृत महत्वहीन कार्य में स्थानांतरित करने का कारण मिला। लेकिन वर्मा पर लगे आरोपों का स्वरूप कैसा था? जो आरोप लगाए गए हैं उसमें से कोई भी पूरी तरह से प्रमाणित नहीं है और कुछ तो गलत भी पाए गए हैं। उसके आधार पर वर्मा को पद से हटाने का फैसला उच्चधिकार समिति कैसे ले सकती है, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा चौबीस घंटे पहले ही बहाल किया गया था? 

आइए देखें कि सीवीसी के निष्कर्ष वास्तव में क्या हैं। पहला आरोप यह है कि वर्मा ने जांच को प्रभावित करने के लिए रिश्वत ली। लेकिन सीवीसी के पास इस बारे में ठोस सबूत नहीं हैं तथा आगे जांच की जरूरत है। दूसरा आरोप है कि वर्मा ने लालू यादव की जांच के दौरान पटना में छापामारी रोकने का प्रयास किया। लेकिन आरोप की पुष्टि नहीं हुई है। तीसरा आरोप है कि मुख्य आरोपी को फायदा पहुंचाने के लिए वर्मा ने बैंक धोखाधड़ी की जांच को अंतिम रूप देने में देरी की। सीवीसी जांच का निष्कर्ष है कि यह आरोप गलत है। चौथा आरोप है कि उन्होंने बैंक धोखाधड़ी मामले की निगरानी के लिए अपनी पसंद का एक सीबीआई अधिकारी रखा। सीवीसी जांच कहती है कि आरोप की पुष्टि नहीं हुई है। पांचवां आरोप है कि दो उद्योगपतियों के बारे में वर्मा ने अन्य एजेंसियों के खुफिया इनपुट्स को साझा नहीं किया। सीवीसी जांच का निष्कर्ष है कि आरोप की पुष्टि नहीं हुई है। पांचवां आरोप है कि हरियाणा में भूमि अधिग्रहण मामलों में पूछताछ के लिए रिश्वत मामले सेवर्मा जुड़े हैं। सीवीसी जांच कहती है कि इसकी और आगे जांच की जरूरत है। 

सातवां आरोप है कि वर्मा दिल्ली हवाई अड्डे पर सोने की तस्करी के मामले में कार्रवाई करने में विफल रहे। सीवीसी जांच का निष्कर्ष है कि मामले की फिर से जांच की जरूरत है। आठवां आरोप है कि वर्मा ने पशु तस्करों की मदद की। सीवीसी जांच कहती है कि आरोप की पुष्टि नहीं हुई है। नौवां आरोप है कि वर्मा ने प्रवर्तन निदेशालय के एक अधिकारी के खिलाफ जांच के मामले में हस्तक्षेप किया। सीवीसी जांच कहती है कि आगे जांच की जरूरत है। क्या सीवीसी की ऐसी रिपोर्ट उस अधिकारी को हटाने के लिए पर्याप्त आधार है जिसकी सेवानिवृत्ति में सिर्फ बीस दिन बाकी थे? नौकरशाही की स्वतंत्रता और निष्पक्षता की रक्षा मूलभूत आवश्यकता से संबंधित है और इसे अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप से अछूता रखना चाहिए। अन्यथा सभी नौकरशाह अप्रमाणित आरोपों के डर के तहत काम करेंगे, जिससे उनके कामकाज और प्रभावशीलता, दोनों गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। 


Web Title: Protect the bureaucracy(cbi) from political interference
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