Life lost due to riots, someone lost his eyes and someone lost his hands | दंगों से अपाहिज हुई जिंदगी , किसी ने गंवाई आंखें तो किसी को गंवाने पड़े हाथ
दंगों से अपाहिज हुई जिंदगी , किसी ने गंवाई आंखें तो किसी को गंवाने पड़े हाथ

(अहमद नोमान)

नयी दिल्ली, 23 फरवरी उत्तर पूर्वी दिल्ली के शिव विहार में रहने वाले मोहम्मद वकील की उनके घर के नीचे ही परचून की दुकान थी। इस दुकान से रोजाना होने वाली लगभग 200 से 300 रुपये की आमदनी से उनके सात सदस्यीय परिवार का गुजारा आराम से चल रहा था।

लेकिन पिछले वर्ष इन्हीं दिनों राजधानी के इस इलाके में हुए सांप्रदायिक दंगों ने उनकी जिंदगी की गाड़ी को पटरी से उतार दिया । दंगे के दौरान फेंकी गई एक तेजाब की बोतल की चपेट में आने से उनकी आंखें चली गईं और वह अब परिवार के भरण पोषण की बात तो दूर अपनी नियमित दिनचर्या के लिए भी दूसरों के मोहताज हैं।

वकील (52), शिव विहार फेज-छह की गली नंबर 13 में बीते तीस साल से रह रहे हैं। पिछले साल 23 फरवरी की शाम को नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के समर्थकों और विरोधियों के बीच मौजपुर इलाके में हुई झड़प के बाद तकरीबन पूरे जिले में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई थी, जिसमें सबसे ज्यादा प्रभावित शिव विहार रहा था।

वकील ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘उस दिन (25 फरवरी को) मैं अपने घर की छत पर था, जब अचानक किसी ने तेजाब से भरी बोतल फेंकी। मेरे चेहरे के पास यह बोतल फटी और मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया।’’

वह बताते हैं, ‘‘पास में मौजूद मेरी बेटी के भी चेहरे और गर्दन पर भी तेजाब के छींटे पड़े और वह भी कराह उठी।‘‘

वकील ने बताया,‘‘हमारी गली में 25 फरवरी को दिनभर तनाव था। परिवार के सारे सदस्य घर में ही थे। शाम तक दंगाई भीड़ उग्र हो गई। हमने घर के दरवाजे बंद कर लिए। मैं बाहर का जायजा लेने छत पर गया था और नीचे देख ही रहा था तभी किसी ने मुझे निशाना बनाते हुए कांच की बोतल फेंकी जिसमें तेजाब भरा हुआ था।''

वकील ने बताया कि तेजाब की वजह से उनकी आंखों की रोशनी पूरी तरह जा चुकी है।

उन्होंने कहा, ‘‘अभी इलाज चल रहा है और डाक्टरों ने भरोसा दिया है कि आंखें इतनी ठीक हो जाएंगी कि मैं बिना किसी सहारे के चल-फिर सकूं।’’

पिछले वर्ष उत्तर पूर्वी दिल्ली के मुस्तफाबाद, करावल नगर, शिव विहार, चांद बाग, ब्रह्मपुरी, यमुना विहार, विजय पार्क, खजुरी और सुभाष मोहल्ला समेत कई इलाकों में हुए दंगों में एक पुलिस कर्मी समेत 53 लोगों की मौत हो गई थी और करीब 500 लोग जख्मी हुए थे। अब एक साल बाद पूरा इलाका दंगे से बरबाद हई जिंदगी की कहानियों से भरा पड़ा है।

सबसे पहले हिंसा मौजपुर-बाबरपुर इलाके में दो समुदायों के बीच टकराव से शुरू हुई और इसके बाद मौजपुर, बाबरपुर, यमुना विहार, बृजपुरी समेत कई इलाकों में सैकड़ों घरों और दुकानों को आग लगा दी गई।

इन दंगों ने वकील की तरह मोहम्मद अकरम की भी जिंदगी पूरी तरह से बदल दी। पेशे से जींस कटिंग मास्टर अकरम रोजाना 1000-1500 रुपये कमा लिया करते थे, लेकिन पिछले साल 24 फरवरी को एक घटना में घायल होने के बाद उनका एक हाथ काटना पड़ा तथा दूसरे हाथ की एक उंगली भी काटनी पड़ी।

अकरम ने बताया कि 24 फरवरी को इज्तिमे (धार्मिक सभा) में जाने के लिए वह घर से निकला था, लेकिन माहौल खराब देखकर वापस आने लगा तो दंगाइयों की भीड़ में फंस गया। उसने बताया,‘‘मैं वजीराबाद रोड पर दंगाइयों से बचकर भाग रहा था और इसी दौरान एक देसी बम मेरे नजदीक फटा जिससे मेरे हाथ पर गंभीर चोटें आईं। अगले दिन डॉक्टरों को मेरा एक हाथ और दूसरे हाथ की एक उंगली काटनी पड़ी।’’

बाईस साल के अकरम कहते हैं कि दिल्ली के दंगों के बाद उनकी जिंदगी को ही लकवा मार गया है। आंखों में आंसू लिए उसका कहना था कि अब तो ‘‘कमीज पहनने के लिए भी मुझे दूसरों की मदद लेनी पड़ रही है।’’

अकरम ने कहा कि अब वह कुछ काम नहीं कर सकता और घर पर ही रहता है।

अकरम ने दावा किया कि पुलिस ने पहले इसे दुर्घटना का मामला बना दिया था और सरकार से सिर्फ 20,000 रुपये मिले थे लेकिन काफी चक्कर काटने और विधानसभा की समिति के समक्ष मामला उठने के बाद जनवरी में उन्हें पांच लाख रुपये का मुआवजा मिल गया है।

गौरतलब है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दंगों में अक्षम हुए व्यक्तियों के लिए पांच लाख रुपये और गंभीर रूप से घायलों के लिए दो लाख रुपये का ऐलान किया था। इसके अलावा जिनके घर पूरी तरह से नष्ट हो गए थे, उन्हें पांच लाख रुपये प्रति मंजिल की दर से मुआवजा मिलना था।

दंगों को एक साल बीतने के बाद भी कई लोग मुआवजा मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने शिव विहार इलाके में कई घरों का निर्माण कराया है, जिसमें वकील का घर भी शामिल हैं।

वकील की पत्नी मुमताज़ ने रोते हुए बताया,‘‘दंगे के दौरान हमें कुछ दिन चमन पार्क के लोगों ने अपने यहां शरण दी। इसके बाद ईदगाह में लगे शिविर में कुछ दिन बिताए। जब घर वापस आए तो पाया कि घर जला दिया गया था। सब कुछ खत्म हो गया था। ''

उन्होंने बताया कि दंगों से कुछ दिन पहले ही उनके बड़े बेटे की एक कैंटीन में नौकरी लगी थी लेकिन पिता को अस्पताल लाने ले जाने की वजह से यह नौकरी भी छूट गई। दो बेटे बेरोजगार हैं जबकि छोटा बेटा और बेटी पढ़ रहे हैं।

वकील ने बताया कि उन्हें सरकार की ओर से अब तक इलाज के लिए 1.80 लाख रुपये और घर के लिए एक लाख रुपये की राशि दी गई है, जबकि बेटी के इलाज के लिए सिर्फ 20,000 रुपये मिले हैं।

वकील से संबंधित मामले में करावल नगर थाने में प्राथमिकी दर्ज है।

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