Highlights इससे पहले जेएनयू में छात्रावास शुल्क में बढ़ोतरी के विरोध में भारी प्रदर्शन हुआ।​​​​​​​आईआईएमसी की स्थापना 50 साल पहले 1965 में तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी के रहते हुई थी।

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रावास शुल्क में बढ़ोतरी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन विश्वविद्यालय परिसर में स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) में भी फैल गया। आईआईएमसी में छात्रों ने महंगी फीस के खिलाफ 3 दिसंबर से प्रदर्शन कर रहे हैं। छात्रों का कहना है कि आईआईएमसी प्रशासन ने उनके मुद्दों पर “आंख बंद” कर ली है।

छात्रों कहना है कि आईआईएमसी एक सरकारी संस्थान है, इसे देखते हुए यह शुल्क बहुत अधिक है। छात्रों का कहना है कि गरीब और मध्य वर्ग के छात्र इतनी फीस का भार नहीं उठा सकते हैं। उन्होंने कहा कि इसके चलते कई छात्रों को पहले सेमेस्टर के बाद संस्थान छोड़ना पड़ता है। 

3 साल में 50% से ज्यादा बढ़ी IIMC की फीस

2015-16 में आईआईएमसी में हिन्दी पत्रकारिता की फीस 60 हजार रुपये थी जो अब बढ़कर 95,500 रुपये हो गई है। आईआईएमसी में वर्तमान में पढ़ रहे छात्रों का कहना है कि उनमें से कई लोगों की स्थिति दूसरी किस्त भरने की नहीं है। 15 जनवरी तक छात्रों को दूसरी किस्त जमा करनी है। हिन्दी पत्रकारिता के छात्र आकाश पांडे कहते हैं, इस साल बाढ़ के चलते उनके गेहूं की फसल बर्बाद हो गई। यहां से आने पहले पिताजी ने कर्ज लेकर भेजा था। किसानों की हालत देश में सब जानते हैं, परिवार ऐसी स्थिति में नहीं है कि दूसरी किस्त दे पाए। आकाश कहते हैं कि सस्ती शिक्षा उनके जैसे गरीबों का भी अधिकार है।

लोकमत न्यूज ने जब छात्रों के आंदोलन और मांगों को लेकर आईआईएमसी के एडीजी मनीष देसाई से बात की। देसाई कहते हैं, सत्र के दौरान में हमने फीस नहीं बढ़ाई है, जो प्रॉस्पेक्टस में हैं, उतनी ही फीस ले रहे हैं। आईआईएमसी एचआरडी मिनिस्ट्री के तहत चालित संस्था नहीं है। आईआईएमसी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत ऑटोनामस बॉडी हैं। आईबी मिनिस्ट्री के तहत जो ऑटोनामस बॉडी है, जैसे आईआईएमसी, एफटीटीआई, एसआरएफटीआई सभी जगह 2008 में ही हर साल दस फीसदी फीस बढ़ाने की बात तय हुई थी।

एडीजी ने बताया, वित्त मंत्रालय के गाइडलाइन्स के तहत हर ऑटोनॉमस बॉडी को अपने बजट का हर साल 30 फीसदी रेवेन्यू इंटरनल जेनरेट करना होता है। छात्रों के फीस कम करने की मांग पर एडीजी कहते हैं, मेरिट और आय के आधार पर संस्थान हर साल जरूरतमंद छात्रों को छात्रवृति देता है। छात्रवृति में 25 फीसदी फीस और कुछ मामलों में 50 फीसदी तक फीस माफ हो जाती है।

उन्होंने बताया, पहले छात्रों को पूरा फीस भरना पड़ता था और मार्च महीने के बाद उन्हें छात्रवृति मिलती थी, लेकिन इस बार दूसरी किस्त जमा करने से पहले ही छात्रों को छात्रवृति दे जाएगी। इसके लिए अगले सप्ताह बैठक बुलाई गई है। उन्होंने दावा किया कि छात्रवृति योजना में संस्थान के सारे जरूरतमंद छात्र आ जाएंगे। उन्होंने जोर देकर इस बात को कहा, आईआईएमसी जो फीस है लगभग एसआरएफटीआई में वही है और इसी तरह की स्ट्रक्चर आईआईटी, एनआईटी जैसे संस्थानों में भी है। देसाई के दावे पर आईआईएमसी के छात्रों ने सवाल उठाए हैं। छात्रों ने प्रेस रिलीज जारी करके कहा, इस साल आईआईएमसी दिल्ली में 274 छात्र हैं और 43 फीसदी छात्रों ने छात्रवृति के लिए आवेदन किया है। छात्रों का कहना है कि छात्रवृति योजना से बहुत ही कम लोगों को लाभ मिल पाएगा इसलिए फीस संरचना बदलना ही विकल्प है। 

आईआईएमसी प्रशासन का कहना है किअगले सत्र में फीस बढ़ोत्तरी नहीं होगी। देसाई कहते हैं, जब संस्थान को लगा कि हर साल दस फीसदी फीस बढ़ाने अच्छा नहीं है तो नया सत्र शुरू होने से पहले ही निर्णय लिया गया कि अब अपने आप बढ़ोत्तरी नहीं होगी। संस्थान हर साल शुल्क संरचना को लेकर अध्ययन करेगा। अगले साल से आईआईएमसी प्रशासन के फैसले का प्रभाव दिखना शुरू हो जाएगा। छात्रों के मेस चार्जेज बढ़ाने के सवाल पर देसाई कहते हैं, यह बात गलत है। टेंडर डाक्यूमेंट देखकर छात्रों ने खुद तय कर लिया कि मेस फी महंगा होने जा रहा है। प्रशासन ने ऐसा कोई सर्कुलर जारी नहीं किया है। पता नहीं विरोध करने वाले छात्र कहां से एंस्पायर्ड हैं।

फीस बढ़ता गया, शिक्षक घटते गए

आईआईएमसी की स्थापना 50 साल पहले 1965 में तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी के रहते हुई थी। चार साल बाद यहां अंग्रेजी पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू हुई थी। आईआईएमसी और उसके सेंटर गेस्ट फैकल्टी के सहारे चल रहे हैं। वो भी दो-ढाई दशकों से। अभी इन छह सेंटरों को सिर्फ आठ स्थायी फैकल्टी मिलकर चला रहे हैं।  2016 में 12 स्थायी फैकल्टी थे, कुछ फैकल्टी के रिटायर होने के बाद भी इन पदों को नहीं भरा गया है। अभी सात प्रोफेसर और एक एसोसिएट प्रोफेसर मिलकर संस्थान चला रहे हैं।

आईआईएमसी में कई साल पढ़ा चुके एक शिक्षक नाम नहीं उजागर करने की शर्त पर बताते हैं कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के अनुसार पोस्ट ग्रेजुएट कोर्सों में प्रति दस छात्रों पर एक स्थायी शिक्षक की नियुक्ति जरूरी है। वर्तमान में आईआईएमसी में जितने छात्र पढ़ते हैं उस हिसाब से 45 से 50 के करीब स्थायी शिक्षक होने चाहिए। आईआईएमसी के एडीजी स्थायी फैकल्टी के सवाल पर कहते हैं, हमलोग विज्ञापन निकाल चुके हैं, ढेर सारे आवेदन भी आ गए है। आठ प्रोफेसर, छह एसोसिएट प्रोफेसर और दो असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्तियां जल्द होने वाली है। अभी स्क्रीनिंग प्रोसेस चल रहा है, जल्द ही इंटरव्यू भी हो जाएंगे। उन्होंने बताया, एक डीम्ड यूनिवर्सिटी बनने के लिए काफी सारे विभाग होने चाहिए। वहां भी शिक्षकों की जरूरत है और इसके अलावा हर सेंटर पर भी। इसके लिए आईआईएमसी प्रशासन ने योजना बना ली है और जल्द ही उसे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भेजेंगे।

आईआईएमसी के पूर्व डीजी और वरिष्ठ पत्रकार केजी सुरेश से भी लोकमत न्यूज ने बात की। तीन साल तक संस्थान के डीजी रहे केजी सुरेश ने कहा, मैं अभी डीजी नहीं हूं, अभी के डीजी के बात करिए। मेरा कार्यकाल मार्च 2019 में समाप्त हो गया, उससे पहले मैंने संस्थान को डीम्ड यूनिवर्सिटी बना दिया। इसके आगे का काम अगले डीजी को करना है, सरकार को करना है। यूनिवर्सिटी बन गई है तो एक डिपार्टमेंट में एक प्रोफेसर, दो एसोसिएट प्रोफेसर, चार अस्सिटेंट प्रोफेसर होने चाहिए। अपने कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाते हुए केजी सुरेश ने कहा, मैंने हर जगह सेंटर चालू करवा दिए। मलयालम, उर्दू, संस्कृत के कोर्सेस शुरू किए। अब मंत्रालय नियुक्तियां नहीं कर रही है तो उनसे पूछना होगा, क्यों नहीं कर रही है। मैंने तो यूनिवर्सिटी बना दिया अब क्यों नहीं बहाली हो रही है?

Web Title: IIMC Fee Movement: Students fees increased by 50 per cent in 3 years, permanent faculty reduced from 12 to 8
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