Fight with Coronavirus Disease COVID-19 daily life chronicles by Lokmat News Hindi Team | कोरोना डायरीज: लॉकडाउन और हम
कोरोना वायरस कोविड-19 से जुड़ी ख़बरों को करने के दौरान और बाद में पत्रकारों पर जो गुजर रही है उसकी दास्तान।

Coronavirus COVID-19 से संक्रमण का पहला मामला चीन के Wuhan प्रांत में 19 नवंबर को सामने आया था।यह वायरस दुनिया के 180 से ज्यादा देशों में फैल गया।  अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे Pandemic (महामारी) घोषित किया। इस महामारी का पूरे विश्व के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। 21वीं सदी में होश संभालने वाली पीढ़ी ने अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ में ऐसी सार्वजनिक आपदा  का पहले कभी सामना नहीं किया था। लोकमत हिन्दी की टीम इस Live Blog में इस आपदा से जुड़े अपने दैनिक अनुभव को शेयर किया। यह ब्लॉग हमने 21 मार्च से 20 अप्रैल तक अपडेट किया। कुल 18 पोस्ट हम सबने लिखीं। कोरोनावायरस से जुड़े समाचार, सूचनाएँ सुझाव और विश्लेषणों के इतर यह हमारी निजी जिंदगियों का रोजनामाचा है। 

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11:50 AM

रंगनाथ सिंह, 20 अप्रैल

आज से केंद्र सरकार जो इलाके कोरोना वायरस के हॉटस्पॉट नहीं हैं उनमें लॉकडाउन में सीमित छूट दे रही है। विडंबना यह है कि दिल्ली के सभी 11 जिले कोविड-19 हॉटस्पॉट हैं। गाजियाबाद में मेरे घर से करीब भी दो हॉटस्पॉट हैं। इसलिए दिल्ली-एनसीआर में रहने वालों के जीवन पर आज से मिलने वाली ढील का शायद कोई व्यावहारिक असर न दिखे।

कल एक सीनियर ने याद दिलाया कि हम जिस स्थिति में 24 मार्च से हैं उस लॉकडाउन में कश्मीर की अवाम 5 अगस्त से है।  सच है, दूसरे की परिस्थिति आप तब तक पूरा नहीं समझ पाते जब तक आप उससे ख़ुद न गुजरे हों।

लॉकडाउन में बहुत सारी पुरानी चीजें और आदतें व्यर्थ लगने लगी हैं। बहुत से काम जो मैंने इतनी उम्र तक नहीं किये उन्हें करने के बाद अहसास हुआ कि यह सब मेरे मेंटल ब्लॉक थे। बहुत सी इच्छाएँ और सदिच्छाएँ भी अब मन का भरम लगने लगी हैं। अभी 13 दिन का लॉकडाउन बाकी है। आगे भी बढ़ सकता है। बचे हुए लॉकडाउन को मैं ज्यादा आत्ममुखी होकर गुजारना चाहता हूँ। 

लाइव कोरोना डायरी लिखने की यह कोशिश भी बहुत सफल नहीं रही। पिछले 20 दिनों में मेरी टीम से केवल मैंने ही इस लाइव डायरी में पोस्ट लिखी है। वो भी केवल तीन। ऐसा लगने लगा है कि मैं अपने आइडिया को घसीट रहा हूँ। इसलिए आज यह लाइव डायरी बन्द कर दूँगा। मुझे कुछ लिखना हुआ तो अपना ब्लॉग लिखूँगा। जीवन विफलताओं का जंगल है जिसमें हमारी नन्हीं सफलताओं के कुछ जुगनू टिमटिमाते रहते हैं और हम जंगल और उसके घुप्प अंधेरे को कुछ देर भूल नींद के आगोश में समा जाते हैं। कुछ ऐसी ही भावभूमि पर रची बाबा नागार्जुन की कविता याद आ रही है, आप भी पढ़ें-

जो नहीं हो सके पूर्ण-काम

मैं उनको करता हूँ प्रणाम ।

कुछ कुण्ठित औ' कुछ लक्ष्य-भ्रष्ट

जिनके अभिमन्त्रित तीर हुए;

रण की समाप्ति के पहले ही

जो वीर रिक्त तूणीर हुए !

उनको प्रणाम !

जो छोटी-सी नैया लेकर

उतरे करने को उदधि-पार;

मन की मन में ही रही¸ स्वयँ

हो गए उसी में निराकार !

उनको प्रणाम !

जो उच्च शिखर की ओर बढ़े

रह-रह नव-नव उत्साह भरे;

पर कुछ ने ले ली हिम-समाधि

कुछ असफल ही नीचे उतरे !

उनको प्रणाम !

एकाकी और अकिंचन हो

जो भू-परिक्रमा को निकले;

हो गए पँगु, प्रति-पद जिनके

इतने अदृष्ट के दाव चले !

उनको प्रणाम !

कृत-कृत नहीं जो हो पाए;

प्रत्युत फाँसी पर गए झूल

कुछ ही दिन बीते हैं¸ फिर भी

यह दुनिया जिनको गई भूल !

उनको प्रणाम !

थी उम्र साधना, पर जिनका

जीवन नाटक दुखान्त हुआ;

या जन्म-काल में सिंह लग्न

पर कुसमय ही देहान्त हुआ !

उनको प्रणाम !

दृढ़ व्रत औ' दुर्दम साहस के

जो उदाहरण थे मूर्ति-मन्त ?

पर निरवधि बन्दी जीवन ने

जिनकी धुन का कर दिया अन्त !

उनको प्रणाम !

जिनकी सेवाएँ अतुलनीय

पर विज्ञापन से रहे दूर

प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके

कर दिए मनोरथ चूर-चूर !

उनको प्रणाम !

08:30 PM

रंगनाथ सिंह, 16 अप्रैल

फ़िल्मों में देखा था कि कोई कैरेक्टर जब जंगल में फँस जाता है और उसके आसपास खाने-पीने का कोई सामान नहीं होता है तो वो ख़ुद को जिंदा रखने के लिए नए-नवेले तरीके ईजाद करता है। लॉकडाउन में 22 दिन अकेले रहने के बाद अब ऐसा ही एहसास हो रहा है। 

तीन दिन से मैंने पार्क में टहलने जाना छोड़ दिया है। वीडी के घर भी जाना लगभग बन्द है। दो-तीन दिन में एक बार बाज़ार जाकर सब्जी-दूध और दूसरी जरूरत की चीज़ें ले आ रहा हूँ। रात को खाना खाकर छत पर टहल लेता हूँ। शायद बाहर जाने की इच्छा कम होती जा रही है या फिर तीन तल्ले से सीढ़ी से नीचे उतरने में आलस्य हो रहा है। 

दो दिन दूध नहीं लाया। बग़ैर कॉफी के रह गया तो लगा कि कुछ मीसिंग है। दूध रोज़ खत्म हो जा रहा था तो मैंने तीन पैकेट दूध एक साथ ले लिया। पहले और दूसरे दिन दो पैकेट चल गये। तीसरे दिन सुबह दूध का पैकट सुबह उबालने के लिए चढ़ाया तो वो फट गया। ब्लैक कॉफी पीकर गुजारा किया लेकिन उसमें वो टेस्ट नहीं मिला जो चाहिए था।

विशेषज्ञों की राय ली तो पता चला कि अगर दूध को उबालकर रख लेता तो शायद तीन दिन चल भी जाता। फटे हुए दूध का आलस्य में फेंका नहीं था। जब विशेषज्ञों को पता चला तो उन्होंने बताया कि उससे पनीर निकाला जा सकता है। मेरे लिए यह बड़े अचरज की बात थी कि मैं ख़ुद घर पर पनीर बना सकता हूँ। मुझे पनीर बनाने की जो विधि बतायी गयी वो काफी सरल थी।

फटे दूध से पानी छानकर कथित पनीर को मैंने अच्छे से गार लिया। मम्मी का कहना था कि मैं उसे पानी में डुबोकर फ्रिज में रख दूँ तो उसका अगले दिन भी इस्तेमाल कर सकता हूँ। लेकिन मैं डर रहा था कि तीन दिन पुराने दूध का पनीर चौथे दिन ख़राब न हो जाए। मैंने तय किया कि उसे तत्काल बनाऊँगा। इस तरह इस जीवन में पहली बार मैंने पनीर और पनीर भुजिया बनाने का क्रिया सम्पन्न की।

 

08:58 PM

रंगनाथ सिंह, 15 अप्रैल

मन कर रहा है कि यह कोरोना डायरी बन्द कर दूँ। मेरे अलावा ज्यादातर लोग इसे भूल चुके हैं। मुझे भी कई दिन बाद याद आता है कि डायरी लिखनी है। कभी लिखता हूँ, कभी टाल देता हूँ। जब यह लाइव ब्लॉग शुरू किया था तो सोचा था कि रोज सुबह उठकर पहले यहाँ ब्लॉग लिखूँगा मगर ये न हो सका और अब ये आलम है....

कोरोना लॉकडाउन की कृपा से करीब 10-12 साल बाद मैंने अपने से सेविंग की। पहला सवाल यह था कि रेजर कहाँ मिलेगा! जिलेट वाला रेजर स्टोर पर मिल रहा था लेकिन करीब 20 दिन की दाढ़ी के लिए जिलेट का होना न होने जैसा ही था। किसी दुकान पर रेजर नहीं मिला तो मैंने घर के पैक सामान में रेजर की तलाश शुरू की। चीज़ों को जल्दी न फेंकने की आदत की वजह से कुछ घण्टों की वजह से मुझे 15 साल पहले खरीदा गया उस्तरा और रेजर मिल गया। 

रेजर मिलने के बाद ब्लेड की खोज शुरू हुई। साधारण ब्लेड भी स्टोर पर मिल नहीं रहा था। दूध वाली आंटी की दुकान पर विल्किंसन का एक पैकेट मिला। मुझे थोड़ी हैरानी हुई कि विल्किंसन का 5 का पैकेट अब भी महज 14 रुपये का मिला। 

दाढ़ी बहुत ज्यादा बढ़ चुकी थी इसलिए रेजर की बजाय उस्तरा आजमाने तय किया लेकिन अन्दर ही अन्दर डर लग रहा था कि कहीं कट गया तो...। ख़ैर, हिम्मत करके उस्तरा लगाना शुरू किया। हाथ काँप रहे थे। काँपते हाथों से किसी तरह शेविंग की। बस होठों पर हल्का ब्लेड लग गया लेकिन कुछ देर बाद ख़ून बन्द हो गया।

शेविंग करने के बाद मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई बहुत बड़ा काम कर लिया हो। ख़ुद पर फक्र सा महसूस हो रहा था। यह सोच-सोच कर हैरानी भी हो रही थी कि मैंने आखिर बार कब ख़ुद से सेविंग की थी मुझे यह याद भी नहीं। 

08:57 PM

रंगनाथ सिंह, 05 अप्रैल

पूरी तरह लॉकडाउन में रहते हुए 12 दिनों से ज्यादा हो गये हैं। हर बीतते दिन के साथ ज़िंदा रहने की नई जद्दोजहद से सामना हो रहा है।

देशबन्दी की घोषणा के तुरन्त बाद ही हमारे सोसाइटी वालों ने बोतलबंद पानी लाने वालों की सोसाइटी में एंट्री बंद करा दी थी। जाहिर है कि जिनके घर में आरओ लगे हुए हैं उन्हें पानी जरूरी सामग्री नहीं लगी। 

सोसाइटी में कुल तीन पानीवाले थे जिनमें से एक ही पानी दे रहा है। हफ्ते भर चले बहस मुबाहिसे के बाद जब सोसाइटी वाले तैयार हुए कि कूड़े वाले की तरह पानीवाले को भी फ्लैट तक आने दिया जाए तो तीसरे पानीवाले ने मेन गेट से अंदर पानी देने से मना कर दिया। 

यानी 20 लीटर की बोतल अब पहले, दूसरे या तीसरे तल्ले तक ख़ुद ढोकर ले जानी पड़ रही है। 

ये अलग बात है कि सोसाइटी वाले अपनी सुविधा के लिए सब्जी और फल वालों को सोसाइटी के अंदर बुला ले रहे हैं। 

पिछले एक हफ्ते से ज़्यादा के अनुभव के बाद कह सकता हूँ कि सोसाइटी एक नई सत्ताएँ हैं जो आपके दैनिक जीवन को पंगु कर देने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम हैं।

आज फिर मेरे घर में पीने का पानी नहीं है और मेरा मेन गेट से पानी की बोतल ढो कर लाने का मन नहीं है तो एक दोस्त से थोड़ा पानी लेकर आज काम चलाऊँगा। 

 

10:23 PM

प्रतीक्षा कुकरेती, 31 मार्च

कोरोना वायरस की वजह से इस दहशत भरे माहौल में मुझे गीता के उपदेश याद आ रहे हैं. जिसमें कहा गया था कि " खाली हाथ आए और खाली हाथ चले. जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। इसीलिए, जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान को अर्पण करता चल. " इसी तरह गीता के एक दूसरे उपदेश में कहा गया है कि "क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा ना पैदा होती है, न मरती है."
एक अन्य उपदेश कुछ इस तरह है- "तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया."

आप ये बिलकुल भी मत सोचना कि मै नेगेटिव हो रही हूं या फिर मुझे किसी भी बात का डर है. बस मन में कुछ उथल पुथल हो रही है. कई बार कुछ अजीब से विचार आते हैं. कोरोना वायरस ने मोह, माया और रिश्तों की सच्चाई हमारे सामने ला दी है. हमे वो आइना दिखाया है जो हमे हकीकत से रूबरू करता है. जिन लोगो की दुर्भाग्यपूर्ण कोरोना से मौत हुई उनके घरवाले उनका अंतिम संसार करने से डर रहे हैं और ना ही परिवार वालों को दाह संस्कार करने दिया जा रहा है.
यही नहीं बीमार मरीजों को मौत के बाद 4 लोगो का कन्धा तक नसीब नहीं हो रहा है.  क्वारंटाइन के दौरान लोग अपने माँ, बाप, पति, पत्नी, या अपने किसी भी प्रियजन से दूर से मिल सकता है. क्यूंकि अपने शारीर को पहले बचाना है. अब लगता है आपका शारीर ही आपका सच्चा साथी है.

मैं अपना ही एक्सपीरियंस आपको बताती हूँ. हफ्ता भर पहले मेरी मम्मी को 103 डिग्री बुखार आया. वो कुछ दिन पहले ही राजस्थान के भीलवाड़ा से लौटी थी. वो कैंसर बीमारी की भी मरीज हैं. ऐसे में उनको बुखार आते है सबको थोड़ा सा डर तो लगा. मेरी मम्मी ने अपने आप को एक कमरे में बंद कर लिया. ना हमारे पास आई ना हम उनके पास गए.

सोचिये जिस माँ ने हमे 9 महीने की इतनी पीड़ा से जन्म दिया हम उनसे दूरी बनाने लगे. मुझे पता है सावधानी ज़रूरी है. मगर अपनों से मोह के धागे बहुत कच्चे है. हम अकेले आए थे अकेले ही जायेंगे. ये शरीर सिर्फ अपना है. लेकिन, सच में ये वक़्त बहुत कुछ सिखा रहा है.

हम क्या प्लानिंग करते है लेकिन भगवान का प्लान कुछ और ही होता है. वक़्त एकदम रुक सा गया है.  मैं बहुत सोशल हूँ लेकिन मैंने सोशल डिस्टेंसींग सीख ली है. कई बार सोचती थी कि हे भगवान क्या नौकरी है मेरी, रोज़ ऑफिस जाओ कितना स्ट्रेस है, क्या रूटीन है, सुबह उठो शाम को आओ. पर्सनल लाइफ है ही नहीं. सैलरी इतनी कम क्यों है. मगर अब लगता है ज़िन्दगी में आपको जो कुछ मिला है उसमे संतुष्ट होना चाहिए. अब वो ही रूटीन बहुत याद आ रहा है.
खैर इस समय हम सबको पॉजिटिव रहना चाहिए. दिन भर अपने दिमाग को किसी दूसरे चीजों में इंगेज रखिए. जो आपको करना पसंद है वो करिए. किताबें पढ़िए, डांस करिए, गाना गाइए, खाना बनाइये, वर्कआउट करिए, कविता लिखिए. जो आपका मन करें. बस अपने दिमाग को शांत रखिये. चलिए अब आपसे अलविदा लेती हूँ.
खुश रहिये
पॉजिटिव रहिये
मुस्कुराते रहिये

10:58 PM

रंगनाथ सिंह, 27 मार्च

पहले मैंने सोचा था कि अपने लगातार सात-आठ दिनों से बर्तन धोने की अनुभव पर ब्लॉग लिखूँगा। ब्लॉग लिखने के लिए लैपटॉप खोलने की प्रक्रिया शुरू ही की थी चश्मे की एक कमानी टूट गयी। मुझे तुरंत ही इहलाम हुआ कि 21 लॉकडाउन में ऐसी अकल्पनीय समस्याएँ हजारों लोगों को आ रही होंगी।

कोरोना की कृपा से दैनिक काम के घण्टे कई घण्टे बढ़ चुके हैं। अब अगले 15 दिनों तक एक टाँग वाले एंटी-ग्लेयर चश्मे के साथ ही काम करना होगा। 

कल शाम को राशन का सामान लेने गया था। दो जनरल स्टोर पर गया। दोनों में जरूरी सामान गायब हो रहे थे। किसी भी दुकान पर सरसों के तेल की बड़ी बॉटल, मैगी, रेडिमेड पाश्ता, सोयाबीन नहीं मिले।

दुकानवालों का कहना था कि आगे से केवल दूध की सप्लाई हो रही है, बाकी कोई सामान नहीं आ रहा है।

ग्राहकों की भिनभिनाहट से पता चला कि गाजियाबाद (वसुंधरा सेक्टर-4) में सब्जियों के दाम लगभग दोगुने हो चुके हैं। कम मानसिक कष्ट हो इसलिए मैंने दाम को लेकर कोई तोलमोल किये बिना जो-जो चाहिए था ले लिया और पैसे देकर घर आ गया।

मैंने कभी इतने दिनों तक लगातार ख़ुद खाना बनाकर नहीं खाया था। दोनों टाइम खाना बनाने की पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए मैंने और विश्व दीपक ने आपसी साझीदार दिखाते हुए तय कर लिया है कि दोपहर में मैं खाना बनाऊँगा और रात को वो। हम दोनों पिछले दो दिनों से अपनी इस साझेदारी पर क़ायम हैं।

बहरहाल, 18 दिनों का लॉकडाउन अभी बाकी है... 

06:05 PM

निखिल वर्मा, 25 मार्च

कोरोना वायरस के खतरे से निपटने के लिए पूरे देश में 21 दिनों का लॉकडाउन लागू किया है. इससे पहले कई राज्य 31 मार्च तक बंद का ऐलान कर चुके है. होली के दौरान कई लोग अपने परिजनों से मिलने एक शहर से दूसरे शहर में जाते हैं. मेरी दीदी और जीजाजी भी होली के समय उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से चलकर बिहार के कटिहार पहुंचे थे. कटिहार में हमारा घर है. जीजाजी की वापसी का टिकट 21 मार्च को था, लेकिन उस दिन ट्रेन रद्द हो गई। भारत में कोरोना वायरस के खतरे से निपटने के लिए सभी बड़े प्रयास होली के बाद शुरू हुए है. पहले स्कूलों को बंद किया, फिर हवाई जहाज और रेलें बंद हुई है. इसके बाद 75 जिलों में लॉकडाउन हुआ और आखिरकार पूरे देश में लोगों को घरों के अंदर रहने के लिए कहा गया. कोरोना वायरस से लड़ने के लिए ये प्रयास अच्छा है. 

मेरे जीजाजी का किडनी ट्रांसप्लांट 2013 में हुआ था. इसके बाद से वे जीवनरक्षक दवाओं पर निर्भर हैं. जब वह लखनऊ से चले थे तो उनके पास 26 मार्च तक दवाई थी. दवाई खत्म से पहले ही वह वापस लौटना चाहते थे लेकिन ट्रेनें कैंसिल होने की वजह उन्हें कटिहार ही रुकना पड़ा. मेरे परिवारवालों ने जिले के डीएम और चीफ मेडिकल ऑफिसर से बात की. उन्होंने दवा लाने का भरोसा दिया लेकिन प्रशासन इसमें असफल रहा. ये दवाई कटिहार के अलावा सीमांचल इलाके में नहीं मिल रहे थे. आखिरकार ये दवाईयां राजधानी पटना में मिली. पटना में दवा खरीद लेने के बावजूद उसे कटिहार लाने का रास्ता ही ढूंढा जा रहा है. पटना से कटिहार की दूरी 300 किलोमीटर है. इस बीच एक रास्ता ये निकला है कि भारतीय रेल ने मालगाड़ियों के संचालन पर कोई रोक नहीं लगाया. मालगाड़ियों द्वारा आवश्यक वस्तुओं को एक जगह से दूसरी जगह भेजा रहा है. घरवालों को उम्मीद है कि अगर पटना के नजदीक हाजीपुर में मालगाड़ी पर अगर दवाईयां दे दी जाए तो कटिहार में उसे उतारा जा सकता है.

04:55 PM

निखिल वर्मा, 24 मार्च

22 मार्च (रविवार) को देश में जनता कर्फ्यू का आह्नान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था जो काफी सफल रहा. जनता कर्फ्यू लोगों के बीच कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए लगाया था. हालांकि इस दिन मुझे घर से निकलना पड़ा. एक पत्रकार मित्र की मां 19 मार्च से अपने घर से लापता थीं. मित्र की मां दिल्ली के सरिता विहार इलाके से गुम हुई थीं. उन्हें भूलने की बीमारी है जिसके चलते कई बार वो अपनों को भी पहचान नहीं पाती हैं. पिछले तीन दिनों हम में से हर कोई अपने स्तर से उन्हें खोजने की कोशिश में लगा हुआ था. मित्रों और पुलिस की तमाम खोजबीन के बाद उनका पता नहीं चल रहा था. इस बीच दो बार उन्हें सरिता विहार से सटे इलाकों में कुछ लोगों ने देखा, इसकी जानकारी मित्र और पुलिस को दोनों हुई. मित्र से बातचीत करके यह तय हुआ है कि आज सड़कों पर लोग नहीं होंगे और मां को खोजने में आसानी होगी. आखिरी बार उन्हें फरीदाबाद के पल्ला थाना के पास देखा गया. हमने अनुमान लगाया कि पल्ला थाना के 10 किलोमीटर रेडियस में ही वह होंगी. इसी के साथ हमारी खोजबीन शुरू हुई. मेरे पास बाइक नहीं थी, लेकिन घर से इस उम्मीद से निकला कि कहीं ना कहीं कोई सवारी मिल जाएगी. उस दिन भाग्य ने मेरा साथ दिया और कुछ देर चलने के बाद सुनसान सड़कों पर एक ऑटो वाला मिल गया. आश्चर्य की बात है कि मैं न्यू अशोक नगर से सरिता विहार अपने मित्र के यहां के यहां करीब 20 किमी का सफर करके पहुंचा तो उस बीच कोई भी अपने ऑटो वाला के अलावा कहीं कोई सवारी नहीं दिखी. इस बीच तीन-चार जगह पर एटीएम से पैसे निकालने की कोशिश करने के बाद मुझे जामिया इलाके एक एटीएम में पैसे आखिरकार मिल ही गए. सरिता विहार मित्र के यहां पर हम बुलेट से मां की खोज में निकले. साथ ही मां का गुमशुदा पोस्टर और फेविकोल रख लिया. मां के निकलने वाले रूट और लोगों द्वारा उन्हें देखें हुए रास्ते हुए बढ़ते गए. मंदिर, सोसाइटी, झुग्गी झोपड़ी के पास हम दोनों जाते और पोस्टर चिपकाते और मां के बारे में पूछताछ करते. इस बीच कई लोग बात करने सामने आए लेकिन कुछ लोगों लगा कि हम कोरोना वायरस से पीड़ित महिला की खोज कर रहे हैं. हमें हर जगह ये बताना पड़ रहा था कि हम अपनी मां को खोजने निकले. बीच में कई जगह बैरिकैंडिग होने वजह से हमें हर बार मां का पोस्टर और अपना आइ-कार्ड निकालकर दिखाना पड़ रहा था. आखिरकार हम पल्ला थाना पहुंचे और एसएचओ से बात की. तीन-चार घंटे की खोज के बाद हम तय किया कि मां एक दिन में 10 किलोमीटर से आगे नहीं जा सकती है. इसलिए इसी 10 किलोमीटर के रेडियस के थानों में पता करना होगा. रात के दस बजे तय किया कि अब सुबह फिर से खोज की जाएगी. इस दौरान हमारे साथ एक सीनियर पत्रकार भी मौजूद थे जिनके पास चार पहिया वाहन थे. मित्र वापस सरिता विहार की ओर निकला और मैं अपने सीनियर के साथ न्यू अशोक नगर की ओर. जगह-जगह रास्ते बंद होने के कारण हमें काफी परेशानियों का सामना पड़ा लेकिन अंतत: हम 11 बजे रात न्यू अशोक नगर के पास सेक्टर 15 मेट्रो पहुंच गए. उस दिन में पहली बार मैंने ऐसा लॉक डाउन देखा था. हालांकि कोरोना वायरस के तहत लॉकडाउन पूरी तरह सही है. अगर मां को खोजना ना होता तो मैं भी उस दिन घर से बाहर नहीं निकलता. सबसे खुशी बात यह है कि हमारे घर लौटने के कुछ ही घंटों में मित्र की मां मिल गईं.

11:34 PM

अभिषेक पाण्डेय, 23 मार्च

आज जब ये पंक्तियां लिख रहा हूं तो कोरोना वायरस से दुनिया भर में मरने वालों का आंकड़ा 15 हजार को पार कर चुका है। पिछले कुछ दिनों में घर हो या बाहर एक ही शब्द सुनाई पड़ता रहा है, कोरोना। चीन में भले ही इस घातक वायरस ने 2020 की शुरुआत से ही कहर ढाना शुरू कर दिया था लेकिन भारत में पहला मामला 30 जनवरी को आया और मार्च तक तो मेरे जैसे ज्यादातर भारतीय इसे चीन में ही फैली महामारी मानकर बेफिक्र थे। लेकिन पिछले 10 दिनों से इस बीमारी ने भारत में न केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, बल्कि सबको अंदर तक झकझोर कर रखा दिया है। भारत में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को सामने आया, 10 मार्च तक ये आंकड़ा 50 था और 23 मार्च तक 450 को भी पार कर चुका है। जिस रफ्तार से कोरोना ने भारत में पैर पसारे हैं, उसने सबके मन में दशहत और खौफ भर दिया है। अब तो सुबह से शाम तक और सोते-जागते, खाते-पीते, हर समय एक ही चर्चा और दिमाग में एक ही ख्याल है, कोरोना। डर का आलम ये है कि अगर कोई आसपास छींक भर दे तो मन होता है कि खुद को सुरक्षा के ऐसे आवरण में ढंक ले, जहां कोई वायरस, कोई बैक्टीरिया छू भी न पाए। 

आज (23 मार्च) साप्ताहिक अवकाश के दिन भी पूरे दिन इस बीमारी की भयावहता की खबरें पढ़ते ही बीता। पत्नी और मैं खुद से ज्यादा अपने नवजात बेटे (12 फरवरी को दुनिया में आगमन) के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं और उसके आसपास स्वस्थ वातावरण बनाने के लिए हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। कोरोना से बचाव के लिए देश के कई राज्यों की तरह नोएडा में भी आज लॉकडाउन का असर आम जनजीवन पर साफ नजर आया। सड़कें सूनी पड़ने लगी हैं, जिसकी शुरुआत काफी हद तक कल (22 मार्च) जनता कर्फ्यू से ही हो चुकी है। पर शायद भारत में लोग अब भी चीन, इटली, स्पेन और अमेरिका जैसे कहीं अमीर देशों को पस्त कर चुकी इस घातक बीमारी के प्रति उतने संजीदा नहीं हैं। इसीलिए अब भी ज्यादातर लोग बिना मास्क के सैर करते और खासकर युवा सोशल डिस्टेंसिंग को धता बताते नजर आ रहे हैं।  

इस संक्रामक बीमीरी से जंग में सबसे कारगर हथियार सोशल डिस्टेंसिंग यानी सामाजिक दूरी ही है। इसी वजह से कंपनी रविवार (22 मार्च) से ही घर से काम करने को कह चुकी है। इसीलिए कल (22 मार्च) का दिन जनता कर्फ्यू के बीच घर से ही काम करने में बीता। इस घातक वायरस के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए पापा पिछले एक हफ्ते से हर दिन घर से ही काम करने और ऑफिस न जाने की सलाह दे रहे थे, पत्नी की चिंता ही यही थी कि ऐसे वक्त में जब पीएम तक घर से न निकलने की अपील कर चुके हों तो आप अपने और बच्चे के स्वास्थ्य की परवाह न करते हुए घर से काम करने के बजाय ऑफिस क्यों जा रहे हैं? अब कम से कम इन दोनों ने राहत की सांस ली है। मेरे घर से काम करने की बात जानकर, मां की भी चिंता कम हुई है।

और हां, काम में भी कोरोना ही हावी है, खेल और खिलाड़ियों से जुड़ी खबरें लगभग नदारद हो चुकी हैं और वहां भी केवल कोरोना से जुड़ी खबरों की भरमार है। आईपीएल टल चुका है, दुनिया भर की खेल प्रतियोगिताएं या तो स्थगित हो चुकी हैं, या रद्द हो चुकी हैं, चर्चा है तो बस कोरोना की।

तमाम सरकारी कोशिशों के बावजूद भारत में कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसे में इस घातक बीमारी को लेकर खुद और परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ती जा रही हैं। कोरोना से मेरे परिवार, देश और इस समस्त जगत की रक्षा की कामना ईश्वर से मेरी प्रार्थना में सम्मिलित हो चुकी है। एहतियात के तौर पर यहां मंदिर केवल आरती के लिए खुल रहे हैं। देश के अन्य हिस्सों की तरह ही नोएडा के लोगों ने भी रविवार को 5 बजे 5 मिनट के लिए थाली, ताली, घंटियों और शंख के नाद से मानो पूरी सृष्टि को गुंजायमान करते हुए जैसे कोरोना के खिलाफ जंग के लिए खुद को तैयार करने का आह्वान किया हो, लेकिन इस घातक दुश्मन से जंग जीतने के लिए इससे कहीं ज्यादा और अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है, उम्मीद है आने वाले दिनों में स्थिति सुधरेगी। हे ईश्वर! हम सबकी रक्षा करें!   

03:39 PM

रंगनाथ सिंह, 23 मार्च

आज शहीद दिवस है। 23 मार्च को ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को लाहौर के सेंट्रल जेल में फांसी दी गयी थी। हमने यह ब्लॉग शुरू किया था यह दर्ज करने के लिए कोरोना वायरस हमारी निजी जिंदगी को किस तरह प्रभावित कर रहा है। लेकिन शहीद दिवस के दिन ब्लॉग लिखते समय मैं यह सोच रहा हूँ कि भगत सिंह और उनके साथियों ने हम कितना प्रभावित किया है? 

कल सन्डे था लेकिन प्रधानमंत्री के आह्वान पर 'जनता कर्फ्यू' था जिसे स्थानीय प्रशासन ने सख्ती से लागू किया। छोटी-मोटी दुकानें भी बंद थीं। दफ्तर के काम में इतना उलझा रहा कि यह ध्यान ही नहीं रहा कि यह लॉकडाउन आगे भी बढ़ सकता है और घर में जरूरी सामान की किल्लत हो सकती है। 

रविवार न्यूज़ के लिहाज से बहुत हेक्टिक रहा। दोपहर बाद यह साफ हो गया कि दिल्ली-एनसीआर में 31 मार्च तक लॉकडाउन रहने वाला है। ख़बर मिलते ही काम के साथ-साथ यह चिंता द़िमाग में कुलबुलाने लगी कि घर में कितने दिनों का दाना-पानी है! तौलमाप के बाद लगा कि दो दिनों के लिए पानी है। सब्जियाँ तो नहीं हैं लेकिन चार-पाँच दिनों के लिए दाल-भात का जुगाड़ घर में है। 

पीएम मोदी के कहने पर देश के ज्यादातर चर्चित हस्तियों ने रविवार शाम 5 बजे थाली-घंटी-ताली बजायी। कोरोना वायरस से लड़ने में मदद कर रहे लोगों के आभार के लिए आयोजित इस कार्यक्रम के खत्म होते ही इससे जुड़े वीडियो की बाढ़ आ गयी। कुछ बेहद चर्चित हस्तियों के वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करते-करते रात के 11 बज गये। अचानक ही बहुत तेज़ भूख लगने लगी। तब याद आया कि काम की व्यस्तता में लंच करना रह गया था। सुबह थोड़ा सा सत्तू पीकर नाश्ते का कोरम पूरा कर लिया था। 

पड़ोस में रहने वाले एक दोस्त से बात हुई थी कि हम रात को खाना बनाकर खाएंगे। 11 बजे उसे फ़ोन किया तो वो खा-पी कर सोने जा रहा था। मैंने शाम को कॉल नहीं किया तो उसे लगा कि मैं खा-पी चुका हूँ। भूख के मारे किचन और लिविंग रूम के दो-तीन चक्कर मारकर मैं सोचता रहा कि क्या करूं, क्या करूं.....सुबह 7 से रात 11 तक करीब 16 घण्टे कोरोना और घंटी ने देह को इतना पस्त कर दिया था कि कुछ बनाने की हिम्मत नहीं हुई और सत्तू पीकर सो गया...

12:39 PM

सतीश सिंह, 23 मार्च

प्रधानमंत्री मोदी और देश के सभी मुख्यमंत्री लॉक डाउन की अपील कर रहे हैं। सभी का कहना है कि आप सुरक्षित तो देश सुरक्षित। मैं रोज मेट्रो से ऑफिस आता था। कल दिल्ली के मुख्यमंत्री ने कहा कि आज यानी 23 मार्च से 31 मार्च तक दिल्ली में लॉक डाउन है। मैं परेशान हो गया।

कैसे ऑफिस जाऊंगा। फिर ऑफिस के संदीप जी को फोन किया। उन्होंने कहा कि मैं अपनी गाड़ी से जाऊंगा। मैं भी उसमें सवार हो गया। उत्तम नगर से कौशांबी की दूरी लगभग 42 किमी है। दिल्ली में लॉकडाउन का असर सुबह से दिखने लगा था। मेट्रो स्टेशन बंद हैं। सड़कों पर सन्नाटा पसरा है।

 जगह-जगह पुलिस बैरिकेड लगे हैं और हर आने-जाने से पूछताछ हो रही है। दिल्ली के सातों जिलों में 31 मार्च तक लॉकडाउन जारी रहेगा। पूरे रास्ते कुछ ही वाहन सड़क पर दिखे। पुलिस के जवान हर जगह मुस्तैद है। हर चेकपोस्ट पर जांच कर रहे हैं। कितनी अजीब बात है न हम सभी घर में रहकर काम तो कर रहे हैं। परिवार के साथ है। लेकिन देश के रक्षक हम सभी की सुरक्षा में तैनात हैं।

लॉक डाउन से कुछ लोग परेशान भी दिखे। दिल्ली में लॉकडाउन का असर दिल्ली-नोएडा बॉर्डर पर देखने को मिला। डीएनडी फ्लाईओवर पर एक किलोमीटर लंबा जाम लगा हुआ था। पुलिस लोगों का आई कार्ड देखने के बाद ही उनको एंट्री दे रही है। लोग परेशान हैं। पुलिस के नोकझोंक भी कर रहे थे। पुलिस वाले बोल रहे थे कि जरूरी हो तो कहीं जाइये, आप घर में रहे सुरक्षित रहें। जय हिन्द, जय भारत...

09:34 PM

धीरज, 22 मार्च

आज का पूरा दिन भारत के लिए ऐतिहासिक था, सुबह से ही देश में खतरनाक वायरस फैल रहा था, संक्रमित लोगों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही थी। उधर, पूरा देश लॉकडाउन था। लोग अपने-अपने घरों में बैठकर, कोरोना के खत्म होने की संभावनाएं जाहिर कर, इससे लड़ने की क्षमता को मजबूत बना रहे थे। लोग पूरे ललक के साथ कोरोना से बचने के उपाय, टेस्ट और लक्षण समेत कई जुड़ी बातों को जानना चाहते हैं।

22 मार्च को देशभर में सन्नाटा पसरा था, महानगरों में गाड़ियों के हॉर्न नहीं बज रहे थे, सकरी गलियों में कोई चिल्लहट नहीं था, सड़कों पर पुलिस बैरिकेंडिग, बगल में सड़क नियम के बोर्ड, दिशा (Road Direction), ट्रैफिक लाइट के सिवाय कुछ नहीं था। लेकिन हमारे पेशे में सुबह से ही कोरोना की खबरों का अंबार लगा हुआ था। देश के अलग-अलग राज्य की सरकारें लॉकडाउन के तारीखों को बढ़ाने में जुटी थी, जो शायद इस खतनाक वायरस से बचने का यही सही तरीका हो सकता है। लेकिन बीच-बीच में थोड़ा गुस्सा तब आ जाता था, जब ये खबर कहीं से आ जाती थी कि कोरोना पॉजिटिव होने के साथ भी वो बाहर घूम रहे हैं। 

लेकिन शाम होते-होते दिन और भी ऐतिहासिक हो गया, जब पूरा शहर तालियों और थालियों की गड़गड़ाहट से गूंजा। लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अपील को अपनी पूरी जिम्मेदारी का निर्वहन किया और उनके कथनानुसार लोग शाम 5 बजे अपने घरों की बालकनी, छतों के ऊपर आ गए और थालियां पीटना शुरू कर दिया। काम छोड़कर मैं बाहर देखने गया, तो मुझे अपने आप पर और उन तमाम लोगों पर गर्व महसूस हो रहा था जो इस कोरोना वायरस से जंग लड़ रहे थे। ऐसा लग रहा था पूरा मोहल्ला कोरोना के जश्न में डूबा था! 

इस बीच मैंने उत्सुकता से एक सामने वाले भाई साहब से पूछ लिया, जो अपने छोटे से परिवार के साथ थाली पीट रहे थे। मैंने पूछा कि क्या आपको मालूम है कि ये क्यों बजा रहे हैं? उन्होंने कहा कि इससे कोरोना वायरस से राहत मिलेगी.. और जल्द ही इस खतनाक वायरस से निजात मिल जाएगा। मैं कुछ बिना बोले अपने काम पर लग गया..। 

खैर, आज का दिन अलग ही था, जिसकी मैंने कभी भी अपेक्षा नहीं की थी।   

10:05 AM

मनाली रस्तोगी, 22 मार्च

साल 2020 शुरू हुए अभी महज कुछ ही महीने बीते हैं, लेकिन देखिए न इस दौरान कितना कुछ बदल गया है। आजकल की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में जहां लोगों के पास अपने परिवार के लिए समय नहीं होता तो वहीं अब अधिकांश लोग कोरोना वायरस की वजह से वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं। हालांकि, कोविड-19 का असर माताओं के काम को अभी भी बाधित नहीं कर पाया है। 

दरअसल वर्क फ्रॉम होम करने पर मुझे मालूम चला कि मेरे पीजी में खाना बनाने के लिए जो मेड आती हैं, वो बेचारी तो आज भी अपने घर से काम करने के लिए निकली हुई है। उसे पीजी आता देख मुझसे रहा नहीं गया, जिसके बाद मैंने उससे पूछ ही लिया कि- दीदी तुम क्यों नहीं कुछ समय बच्चों के साथ बिताती हो?

खैर, मां तो मां ही होती है तो दीदी ने भी तुरंत जवाब दिया कि क्या बताऊं! अब बच्चों को पालना है तो काम पर तो आना ही पड़ेगा और फिर हम लोगों को छुट्टी कहां मिलती है, लेकिन आज बच्चे जरुर बोल रहे थे कि मम्मी घर पर रुको ना। 

उसकी ये बात सुनकर मुझे इस बात का एहसास हुआ कि हमारे लिए तो वर्क फ्रॉम होम हो रहा है। मगर जिनका काम उन्हें ऐसा करने की इजाजत नहीं देता, वो कोरोना वायरस से बचाव कैसे करें क्योंकि जब आप काम पर निकले हो तो तमाम लोगों के कांटैक्ट में जरुर आएंगे। 

ऐसे में बस इतना ही कहना चाहूंगी कि जो भी करिए लेकिन अपने आपका और अपने परिवार का पूरा ध्यान रखिए। 

09:00 AM

अनुराग आनंद, 22 मार्च

आज सुबह अचानक अपने बचपन की यादें आनें लगी। सोचिए,  उमस भरी गर्मी की शाम हो और छत पर अपनी दादी के जांघों पर आप अपना माथा टेककर लेटे हुए कहानियां सुन रहें हैं। आकाश में चांद खिला हुआ है और आपकी दादी उस चांद की ओर उंगलियां दिखाकर आपको किस्सा सुना रही है। 

आस पड़ोस के पेड़ों की पत्तियां हिल तक नहीं रही है, गर्मी इतनी की मन अंदर से बेचैन हुए जा रहा है। लेकिन, दादी की कहानियों का सम्मोहन ऐसा कि आप गर्मी की बेचैनी को भूल जाते हैं..लगातार कहें जाते हैं फिर क्या हुआ ...अच्छा फिर ... इस तरह आप कहानियों में डूब जाते हैं।

इसी बीच एक अजनबी बंदूक लिए आता है और आपकी दादी को गोली मार देता है। जरा सोचिए इस वक्त आप कैसा महसूस कर पा रहे होंगे। यह कोरोना वायरस मुझे उसी अजनबी अपराधी की तरह महसूस होता है।

यकीन मानिए यह कोरोना वायरस हमारे और आपके घर के बुजुर्गों के लिए एक अभिशाप की तरह है। यह हमारी और आपकी कहानी को हमसे दूर कर दे रहा है।

मैं इतना भाग्यशाली नहीं हूं कि मेरे दादा-दादी जिंदा हों लेकिन यदि आपके घर में कोई बुजुर्ग हैं तो उनका ख्याल रखिए।  हमारी और आपकी जिंदगी में जो लय है वह उन्हीं किस्सेबाजों की देन है।

वह हमारे घर के मजबूत स्तंभ हैं। भला अपने घर की स्तंभ को हम कैसे कमजोर होने देंगे। आपकी और हमारी जिंदगी को लय देने वाले इन बुजुर्गों को बचा लीजिए।

आज अचानक इटली में मर रहे बुजुर्गों के आंकड़े को देख मुझे मेरा बचपन याद आ गया। वह गोद, वह कहानी और उनकी डांट याद आ गई।

कई साल हो गए अब कोई मुझे चांद दिखाकर कहानी नहीं सुनाता और न ही किसी कहानी को सुनने के लिए मेरे पास इतने समय रहे।

शायद मेरे घर के बुजुर्गों को मेरे शहर आने के बाद लग गया था कि उनके किस्सागोई को अब कौन सुनेगा...इसलिए उन्होंने हमें छोड़ दिया। लेकिन, इन छुट्टियों में आप अपने घर के बुजुर्गों व उनके कहानियों से लिपट जाइये।     

07:46 AM

रंगनाथ सिंह, 22 मार्च

आम तौर पर रविवार को मैं देर तक सोता हूँ। लेकिन पिछले कुछ दिनों से सुबह जल्दी नींद खुल जा रही है। आज सन्डे होने के बावजूद तड़के आँख खुल गयी। किसी तरह की एंजाइटी दिमाग़ में घर कर जाने पर मेरे संग अब ऐसा ही होता है। उसका सीधा असर मेरी नींद पर पड़ता है।

कल जब लाइव ब्लॉग शुरू किया तो सोचा कि टीम के साथियों को इसमें लिखने के लिए प्रेरित करने का सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि मैं रोज़ सुबह ख़ुद ब्लॉग लिखूँगा और ब्लॉग में लगी कोरोना वायरस की टैली अपडेट करूँगा। आज सुबह यही किया भी।

कल देर शाम ऑफिस से घर आने तक पूरी दुनिया में मौत के कुल आँकड़े 11,418 थे। आज सुबह जब डाटा अपडेट किया तो कोविड-19 से मरने वालों की संख्या 13,050 हो चुकी है। मेरे घर आकर खाने फिर सोने और सुबह उठने के बीच मरने वालों की संख्या में 1632 लोगों का इजाफा हो गया!  करीब 12 घण्टे में 1632 लोगों की मौत की ख़बर! पूरे बदन में एक सिहरन सी दौड़ गयी। 

दिमाग में डर का घर

कल शाम जब दफ़्तर से घर आया तो सोसाइटी के गार्ड ने गेट पर रोक लिया। कुछ सेकेण्ड तक मैं समझ ही नहीं पाया कि वो मुझसे चाहता क्या है। वो मुझे हैंड सैनिटाइजर ऑफर कर रहा था ताकि मैं अपने हाथ सैनिटाइज कर सकूँ। मैंने उसे यह कहते हुए मना कर दिया कि फिर उसी हाथ से हैंडल पकड़ूँगा तो क्या फायदा! लेकिन गेट से आगे बढ़ने के कुछ मिनट बाद ही मैंने गाड़ी रोक ली। मैं सोचने लगा कि मैंने सही किया या ग़लत किया? क्या मैं फिर से जाकर हाथ सैनिटाइज कर लूँ? 

उससे पहले ऑफिस की लिफ्ट में मुझे छींक आ गयी तो मैंने आदतन अपना हाथ मुँह के आगे कर लिया। लिफ्ट में मैं अकेला था। लेकिन तुरंत मेरे ज़हन में यह सवाल कौंध गया कि क्या अब इसी हाथ से मुझे गाड़ी चलाना चाहिए? यह भी चलने लगा कि इसी हाथ से मैं अब यहाँ से घर तक क्या-क्या टच करूँगा?

09:52 PM

धीरज, 21 मार्च

इस वक्त कोरोना से पूरा विश्व युद्धस्तर लड़ रहा है, जिसमें मैं भी शामिल हूं। आते-जाते वक्त लोगों को शक के निगाह से देखना पड़ रहा है। मन में यही सवाल उठता है कि आखिर अगला आदमी कहां से आ रहा होगा, किससे मिला होगा, कहीं ये भी किसी पार्टी में शामिल तो नहीं हुआ। यही हुआ आज मेरे साथ भी। बीती रात मेरा रूम पार्टनर गायब रहा। शायद किसी दोस्त के घर गया था। सुबह जब दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनाई दी तो समझ गया था कि वही है। जैसे ही मैं दरवाजा खोला, मैंने कहा, मत आया होता। लेकिन, पूरे गर्मजोशी के साथ उसे मैंने हाथ धुलने के लिए कहा। इतना ही नहीं मैंने पूछा कहीं खांसी तो नहीं आ रही, तबियत ठीक है ना। फिर मैंने कहा अब बाहर मत निकलना।

खैर, यह जरूरी भी है। हम नोएडा में एक फ्लैट में रहते हैं। जैसा कि जानते हैं कि नोएडा में कोरोना के कई मामले ताजा पाए गए थे। जिसकी वजह से डर और बढ़ गया था। आज पूरे दिन मम्मी, तीन से चार बार कॉल कीं। कोरोना को लेकर मम्मी को डर तब पता चला जब उसने वीडियो कॉल कर मुझे देखना चाहा और जनना जाहा कि घर में हो या ऑफिस। लेकिन मैं घर पर था और यहीं से ऑफिस का काम (WFH) कर रहा था। मम्मी को देखकर कुछ तसल्ली हुई। इसके लिए ऑफिस को शुक्रिया। मुंबई से मेरे बड़े भाई साहब का फोन आया, जिनका अभी हाल ही में रेलवे विभाग में नौकरी लगी है। उन्होंने कहा कि यहां तो सब बंद है, बाकी तुम भी फिलहाल घर में ही रहो। यही सलाह घर के कई सदस्यों ने फोन पर दिया।

लेकिन दुख तब हुआ जब गांव में कोरोना को लेकर कई अफवाहें फैली है। घर के भाई साहब ने बताया कि कोरोना से बचने के लिए गांव में लोग शाम को दीया जला रहे हैं। मतलब हद है! कई और ऐसे अफवाहों से मेरा पाला पड़ा। सारे अफवाहों को दूर करते हुए मैंने कहा कि लोगों को समझाएं और जो कोई बाहर से आ रहा है, उनसे थोड़ा दूरी बनाए रखें... और जितना हो सके अपने आप को लॉकडाउन रखें, तभी कोरोना को रोका जा सकता है... चलिए आज के लिए इतना ही...।

06:07 PM

आदित्य द्विवेदी, 21 मार्च

सुबह मां से बात हुई. परेशान थीं. कहने लगी छुट्टी लेकर घर आ जाओ. मन नहीं लग रहा तुम वहां हो. दिल्ली में कोरोना वायरस का ज्यादा खतरा है. जिंदगी से ज्यादा जरूरी काम थोड़ी है. 

आमतौर पर मैं मां के तमाम लॉजिक और मान्यताओं पर कभी सवाल नहीं उठाता. असहमति होने के बावजूद उनकी बात मान लेता हूं. लेकिन आज अंदर से फीलिंग आई कि मां को कन्विंस करना पड़ेगा कि जो मैं कर रहा हूं, इस वक्त वो बेहद जिम्मेदारी भरा और ज्यादा जरूरी क्यों है. लेकिन बड़ा सवाल ये था कि उन्हें कैसे समझाया जाए.

मैंने मां से कहा याद है 1999 की कारगिल वॉर. जब बड़े भैया (आर्मी मैन) छुट्टियों पर घर पर थे. लेकिन अचानक उन्हें वापस ड्यूटी पर बुला लिया गया था.

मां ने कहा- लेकिन वो जंग थी ना.

मैने कहा- ये उससे भी बड़ी जंग है मां. इस वक्त जरूरत है लोगों को जागरूक करने की. उन तक सही और सटीक जानकारी पहुंचाने की. यही मेरा काम है. इस वक्त मैं इस जिम्मेदारी को पीठ कैसे दिखा सकता हूं. 

बहरहाल, कुछ और एग्जांपल देने के बाद मां को समझ आ गया. फिर भी उन्होंने ढेर सारी हिदायतें दे डाली. 

फोन रखते हुए उन्होंने कहा कि मैंने ग्राम देवी तक पानी की धार बना दी है और दीप भी जला दिया है. अब कोरोना गांव में नहीं घुस पाएगा.

मैंने कहा- बस इसीलिए मुझे और मेहनत से अपना काम करने की बहुत जरूरत है ताकि लोगों को पता चल सके कि पानी की धार बना देने से कोरोना नहीं रुकेगा.

दोनों की हंसी के साथ फोन कट गया!

#LifeInTheTimeOfCorona

05:13 PM

रंगनाथ सिंह, 21 मार्च

चीन के वुहान से होता हुआ कोरोना दुनिया के 185 देशों और भारत के 22 राज्यों से होते हुए हमारे ज़हन के अंदर प्रवेश कर चुका है। मीडिया में काम करने का प्रतिफल है कोई भी बुरी ख़बर हो वो आप तक गोली की रफ्तार से पहुंचती है। कोरोना वायरस के एक शहर से दूसरे शहर फैलने की ख़बरों के बीच पिछले कुछ दिनों से मैं ख़ुद को एक अजीब से स्ट्रेस से घिरा पा  रहा हूँ।

प्रोफेशनल वजहों से कोरोना वायरस जैसी आपदा के समय हमारा काम साधारण दिनों से बढ़ जाता है। लेकिन पर्सनल लाइफ में जिससे भी बातचीत होती है वो सारा काम घर छोड़कर घर बैठने की सलाह देने लगता है। पिछले दो-तीन दिनों में मेरी अपने कई घरवालों से इसे लेकर बहस हो चुकी है। ऐसा नहीं है कि मीडिया में काम करने से हमारे अंदर के डर, असुरक्षाएँ और आशंकाएँ ख़त्म हो जाते हैं। लेकिन हमारे पास शायद दूसरा कोई विकल्प नहीं है।

हम दुनिया की दुनिया को ख़बर देते हैं लेकिन हमारा हाल-समाचार कोई नहीं पूछता। इसलिए अपनी आपबीती हम ख़ुद लिखेंगे। अपने निजी अनुभवों को शब्द देने के लिए ही मैं और मेरे साथी इस जगह नियमित ब्लॉग लिखते रहेंगे। 

Web Title: Fight with Coronavirus Disease COVID-19 daily life chronicles by Lokmat News Hindi Team
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