Farmers raised doubts over the fairness of the committee set up by the court, and said that the protest would continue | किसानों ने न्यायालय द्वारा गठित समिति की निष्पक्षता पर संदेह जताया, प्रदर्शन जारी रखने की बात कही
किसानों ने न्यायालय द्वारा गठित समिति की निष्पक्षता पर संदेह जताया, प्रदर्शन जारी रखने की बात कही

नयी दिल्ली, 12 जनवरी किसान नेताओं ने मंगलवार को कहा कि वे अगले आदेश तक तीन कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाए जाने के उच्चतम न्यायालय के आदेश का स्वागत करते हैं। हालांकि, साथ ही कहा कि वे उच्चतम न्यायालय की तरफ से गठित समिति के समक्ष पेश नहीं होंगे और आरोप लगाया कि यह ‘‘सरकार समर्थक’’ समिति है। किसान संगठनों ने कहा कि उन्हें तीनों कृषि कानूनों को वापस लिए जाने से कम कुछ भी मंजूर नहीं है।

उन्होंने समिति के सदस्यों की निष्पक्षता पर भी संदेह जताया है।

इस बीच, केंद्र सरकार ने मंगलवार को कहा कि तीन कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर उच्चतम न्यायालय की रोक उसकी इच्छा के विपरीत है लेकिन शीर्ष अदालत का निर्देश ‘‘सर्वमान्य’’ है।

केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री कैलाश चौधरी ने पीटीआई-भाषा को दिए एक साक्षात्कार में उच्चतम न्यायालय द्वारा गतिरोध समाप्त करने के लिए गठित समिति को ‘‘निष्पक्ष’’ बताया और कहा कि सरकार वार्ता के लिए हमेशा तैयार रही है लेकिन यह किसान संगठनों पर निर्भर है कि 15 जनवरी को निर्धारित नौवें दौर की वार्ता में वे आगे बढ़ना चाहते हैं या नहीं।

राजस्थान से सांसद चौधरी ने कहा कि उन्हें भरोसा है कि शीर्ष न्यायालय का जो भी फैसला होगा वह ‘‘कानूनों को उनके मौजूदा स्वरूप’’ में क्रियान्वयन सुनिश्चित करने से संबंधित होगा।

उन्होंने कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय का आदेश हमारी इच्छा के विपरीत है। हम चाहते हैं कि ये कानून जारी रहें। हालांकि अदालत का फैसला सर्वमान्य है।’’

उधर, द्रमुक और रांकापा जैसे विपक्षी दलों ने अदालत के निर्णय का स्वागत किया जबकि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने केंद्रीय कृषि कानूनों को लेकर चल रहे गतिरोध को खत्म करने के मकसद से उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति के चारों सदस्यों पर सवाल खड़े करते हुए मंगलवार को कहा कि क्या ‘कृषि विरोधी कानूनों’ का समर्थन करने वालों से न्याय उम्मीद की जा सकती है।

उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘क्या कृषि-विरोधी क़ानूनों का लिखित समर्थन करने वाले व्यक्तियों से न्याय की उम्मीद की जा सकती है? ये संघर्ष किसान-मज़दूर विरोधी क़ानूनों के ख़त्म होने तक जारी रहेगा। जय जवान, जय किसान!’’

कांग्रेस पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने संवाददाताओं से बातचीत में दावा किया कि समिति के इन चारों सदस्यों ने इन कानूनों का अलग-अलग मौकों पर खुलकर समर्थन किया है।

उन्होंने सवाल किया, ‘‘जब समिति के चारों सदस्य पहले से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और खेत-खलिहान को बेचने की उनकी साजिश के साथ खड़े हैं तो फिर ऐसी समिति किसानों के साथ कैसे न्याय करेगी?’’

सुरजेवाला ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को जब सरकार को फटकार लगाई तो उम्मीद पैदा हुई कि किसानों के साथ न्याय होगा, लेकिन इस समिति को देखकर ऐसी कोई उम्मीद नहीं जगती।

वहीं, अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (आईकेएससीसी) की ओर से जारी बयान में कहा गया, ‘‘यह स्पष्ट है कि कई शक्तियों द्वारा समिति के गठन को लेकर भी न्यायालय को गुमराह किया जा रहा है। समिति में वो लोग शामिल हैं जिनके बारे में पता है कि उन्होंने तीनों कानूनों का समर्थन किया और इसकी खुलकर पैरवी भी की थी।’’

उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने तीन नये कृषि कानूनों को लेकर सरकार और दिल्ली की सीमाओं पर धरना दे रहे रहे किसान संगठनों के बीच व्याप्त गतिरोध खत्म करने के इरादे से मंगलवार को इन कानूनों के अमल पर अगले आदेश तक रोक लगाने के साथ ही किसानों की समस्याओं पर विचार के लिये चार सदस्यीय समिति गठित कर दी।

प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमणियन की पीठ ने सभी पक्षों को सुनने के बाद समिति के लिये भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपिन्दर सिंह मान, शेतकारी संगठन के अध्यक्ष अनिल घनवत, दक्षिण एशिया के अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति एवं अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. प्रमोद जोशी और कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी के नामों की घोषणा की।

किसान नेताओं ने यह भी कहा है कि वे समिति की किसी भी गतिविधि में शामिल होने के इच्छुक नहीं है, लेकिन इस बारे में किसान संगठनों का समूह ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ कोई औपचारिक फैसला करेगा।

करीब 40 आंदोलनकारी किसान संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले संयुक्त किसान मोर्चा ने अगले कदम पर विचार करने के लिए आज बाद में एक बैठक बुलाई है।

मोर्चे के वरिष्ठ नेता अभिमन्यु कोहाड़ ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘कृषि कानूनों पर रोक लगाने के अदालत के आदेश का हम स्वागत करते हैं लेकिन हम चाहते हैं कि कानून पूरी तरह वापस लिए जाएं, जो हमारी मुख्य मांग है।’’

एक अन्य किसान नेता हरिंदर लोखवाल ने कहा कि जब तक विवादास्पद कृषि कानून वापस नहीं लिए जाते हैं, तब तक प्रदर्शन जारी रहेगा।

अखिल भारतीय किसान सभा (पंजाब) के उपाध्यक्ष लखबीर सिंह ने कहा, ‘‘समिति के विचार पर हमें विश्वास नहीं है और जब सरकार ने समिति के गठन का सुझाव दिया था तभी से हम यह कहते रहे हैं। लेकिन इस बार उच्चतम न्यायालय ने ऐसा कहा है और हम इस समिति के कामकाज को देखेंगे।’’

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने तीन नए कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाए जाने और सरकार एवं किसान संगठनों के बीच जारी गतिरोध को हल करने के वास्ते चार सदस्यीय समिति गठित किए जाने के उच्चतम न्यायालय के आदेश का स्वागत किया।

पवार ने ट्वीट कर कहा, '' तीन कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाया जाने और मुद्दे को हल करने के वास्ते चार सदस्यीय समिति गठित किए जाने का उच्चतम न्यायालय का आदेश स्वागत योग्य है।''

द्रमुक नेता एमके स्टालिन ने भी उच्चतम न्यायालय के निर्णय का स्वागत किया और कहा कि यह आंदोलनकारी किसानों की जीत है।

उधर, पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह ने मंगलवार को राज्य के महाधिवक्ता को नए कृषि कानूनों पर रोक लगाने के उच्चतम न्यायालय के आदेश की विस्तारपूर्वक समीक्षा करने का निर्देश दिया है। साथ ही उन्होंने इस मुद्दे पर चर्चा के लिये मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई है। मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार रवीन ठुकराल ने यह जानकारी दी।

सिंह ने उच्चतम न्यायालय के आदेश की पेचीदगियों पर चर्चा करने के लिये बृहस्पतिवार को मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई है।

वहीं, भाजपा के प्रवक्ता नलिन कोहली ने उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति पर संदेह जताए जाने को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस नीत यूपीए शासनकाल में भी कृषि सुधार का समर्थन करने वाले विपक्षी दल कांग्रेस ने राजनीतिक कारणों से पलटी मार ली है।

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