Elgar case: High court granted interim bail of six months to Varvara Rao on medical grounds | एल्गार मामला : उच्च न्यायालय ने वरवर राव को चिकित्सा आधार पर छह महीने की अंतरिम जमानत दी
एल्गार मामला : उच्च न्यायालय ने वरवर राव को चिकित्सा आधार पर छह महीने की अंतरिम जमानत दी

(नाम में सुधार के साथ)

मुंबई, 22 फरवरी बंबई उच्च न्यायालय ने एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले में आरोपी एवं बीमार कवि वरवर राव को चिकित्सा के आधार पर सोमवार को छह महीने की अंतरिम जमानत दे दी।

अदालत ने कहा कि वह हिरासत के दौरान 82 वर्षीय राव के स्वास्थ्य में गिरावट को देखते हुए ‘मूक दर्शक’ नही बनी रह सकती।

न्यायमूर्ति एसएस शिंदे और न्यायमूर्ति मनीष पिटाले की पीठ ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि मौजूदा स्वास्थ्य स्थिति में अगर राव को हिरासत में रखा जाता है तो ‘‘उनकी बीमारी और समस्या और बढ़ेगी।’’

अदालत ने रेखांकित किया कि नवी मुंबई स्थित तलोजा जेल अस्पताल में मौजूदा चिकित्सा अपर्याप्त है।

राव का इस समय मुंबई के नानावती अस्पताल में इलाज चल रहा है।

राव 28 अगस्त 2018 से ही न्यायिक हिरासत में हैं और इस मामले की जांच राष्ट्रीय अन्वेषण अधिकरण (एनआईए) कर रहा है।

पीठ ने राव को छह महीने की अंतरिम जमानत देने के साथ ही निर्देश दिया कि वह इस अवधि के दौरान शहर की एनआईए अदालत के न्यायाधिकार क्षेत्र में ही रहेंगे।

अदालत के अनुसार राव को अस्पताल से छुट्टी दी जाएगी जो उनके स्वास्थ्य की स्थिति पर निर्भर है। पीठ ने कहा कि अस्पताल से छुट्टी के तुरंत बाद उन्हें जमानत पर रिहा किया जाए।

चिकित्सा के आधार पर राव को जमानत देने के साथ अदालत ने एनआईए के उस दलील को खारिज कर दिया कि वह मानवीय आधार पर राहत पाने के हकदार नहीं हैं।

पीठ ने राव को जमानत देने के साथ कई सख्त शर्तें भी लगाई है जिनमें मामले के सह-अभियुक्तों से संपर्क स्थापित करने पर भी रोक शामिल है।

अदालत ने महाराष्ट्र सरकार के उस रुख को भी अस्वीकार कर दिया जिसमें उसने राव को नानावटी अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद मुंबई के सरकारी जेजे अस्पताल में बने कैदी वार्ड में स्थानांतरित करने को कहा था।

अदालत ने कहा, ‘‘हमारा विचार है कि एक संवैधानिक अदालत के नाते यह अदालत विचाराधीन कैदी को लेकर मूकदर्शक नहीं हो सकती जिसे जेल भेजा गया और फिर सरकारी अस्पताल जहां उसकी सेहत में और गिरावट आई।’’

उच्च न्यायालय ने अपने 92 पन्ने के फैसले में कहा, ‘‘अंतत: अदालत के हस्तक्षेप के बाद शीर्ष निजी सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल में स्थानांतरित करना पड़ा।’’

पीठ ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर वह इस नतीजे पर पहुंची है कि राव को तलोजा केंद्रीय कारागार भेजना जहां पर वह नानावटी अस्पताल से स्थानांतरित करने से पहले विचाराधीन कैदी के तौर पर रहे थे, उनके ‘जीवन को खतरे में डालने’ और स्वास्थ्य व जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करने जैसा होगा।

अदालत ने रेखांकित किया कि पूर्व में राव के परिवार ने जेल में उनके स्वास्थ्य की जानकारी हासिल करने के लिए अदालत का रुख किया है।

अदालत ने टिप्पणी की कि राव जेल में कई बीमारियों से ग्रस्त हैं और यहां तक कोविड-19 की चपेट में भी आ गए थे और उन्हें अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही नानावटी अस्पताल में भर्ती कराया गया।

पीठ ने कहा, ‘‘विचाराधीन (राव) कैदी को बार-बार सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया जो साबित करता है कि पूर्व में वहां चिकित्सा सुविधा अपर्याप्त थी, जिसकी वजह से विचाराधीन कैदी और उसके परिवार ने हिरासत में भेजने पर उनकी खराब होती सेहत का हवाला देकर इलाज का निर्देश देने के लिए बार-बार अदालत का रुख किया।’’

पीठ ने कहा कि राव की पूर्व में जमा मेडिकल रिपोर्ट में इंगित किया गया है कि वह उम्र संबंधी कई बीमारियों से ग्रस्त हैं और कुछ रिपोर्ट में उनमें डिमेंशिया के लक्षण होने का भी जिक्र है।

अदालत ने कहा कि इसलिए उनका परिवार बेहतर देखरेख कर सकता है।

फैसले में अदालत ने राव का पक्ष रखने वाली वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह के तर्क का भी संदर्भ दिया है जिसमें उन्होंने कहा कि राव कितने साल जिंदा रहेंगे और किसी 82 वर्षीय वर्ष के व्यक्ति को कैद रखने का क्या मतलब है।

अदालत ने कहा, ‘‘विचाराधीन कैदी की कितनी उम्र बची है उसका भी कुछ औचित्य है।’’

पीठ ने कहा, ‘‘यह स्वीकार करना चाहिए कि विचाराधीन कैदी की उम्र 82 साल है और वह उपरोक्त स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त है, उसे अपने परिवार के समर्थन की जरूरत है ताकि जो भी जिंदगी के बचे हुए समय को आराम से बिता सके।’’

राव के हैदरबाद जाने एवं अपने साथियों से मिलकर ‘संदिग्ध गतिविधियों’ के दोबारा शुरू करने के एनआईए की आशंकाओं पर भी अदालत ने संज्ञान लिया।

पीठ ने कहा कि राव को मुंबई पुलिस को हर पखवाड़े व्हाट्सएप पर वीडियो कॉल करना होगा।

अदालत ने राव को मामले से जुड़े किसी सह आरोपी से संपर्क करने या ‘इस तरह की गतिविधियों से जुड़े व्यक्ति से राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय फोन कॉल करने पर भी रोक लगाई है।

अदालत ने कहा कि बड़ी संख्या में लोगों को राव से मिलने की अनुमति नहीं होगी और निर्देश दिया कि वह अपना पासपोर्ट एनआईए अदालत में जमा कराएं।

अदालत ने राव पर मामले को लेकर प्रेस में कोई बयान देने पर भी रोक लगाई है और उन्हें उस तरह की किसी भी गतिविधि में शामिल होने की मनाही होगी जिसकी वजह से उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है।

अदालत ने कहा, ‘‘आवेदक की जोखिमपूर्ण स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए... हमारी राय है कि यह राहत देने का सही एवं उपयुक्त मामला है।’’

पीठ ने कहा, ‘‘ऐसा नहीं करने पर, हम मानवाधिकार की रक्षा करने एवं संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में समाहित स्वास्थ्य की रक्षा करने के अपने संवैधानिक कर्तव्य से विमुख होंगे।’’

अदालत ने राव को निर्देश दिया कि जमानत अवधि समाप्त होने पर वह एनआईए अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण् करे या जमानत की अवधि बढ़ाने के लिए उच्च न्यायालय में आवेदन करें।

अदालत ने एनआईए की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल अनिल सिंह ने राव को अस्पताल से छुट्टी देने पर तीन हफ्ते की रोक लगाने का अनुरोध किया जिसे अदालत ने अस्वीकार कर दिया।

अदालत ने कहा कि राव को 50 हजार रुपये का व्यक्तिगत बांड जमा करने के साथ-साथ ही इतनी ही राशि के दो मुचलके देने होंगे।

वरवर राव को चिकित्सा आधार पर जमानत देने की याचिका तथा उनकी पत्नी हेमलता की रिट याचिका पर उच्च न्यायालय में एक फरवरी को बहस पूरी हो गई थी और अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

रिट याचिका में दावा किया गया था कि उचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने एवं कैद में रखे जाने से वरवर राव के मौलिक अधिकारों की अवहेलना हो रही है।

गौरतलब है कि यह मामला 31 दिसंबर 2017 में पुणे में आयोजित एल्गार परिषद के कार्यक्रम में कथित तौर पर भड़काऊ भाषण देने से जुड़ा है। पुलिस का दावा है कि इस भाषण की वजह से अगले दिन कोरेगांव-भीमा में हिंसा फैली।

पुलिस का दावा है कि इस कार्यक्रम का आयोजन करने वाले लोगों के माओवादियों से संबंध हैं।

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