कवि मलखान सिंह का निधन, दलित आवाज और आक्रोश की अमिट पहचान थे

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Published: August 9, 2019 12:55 PM2019-08-09T12:55:29+5:302019-08-09T13:13:41+5:30

30 सितंबर 1948 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में जन्म हुआ था। मलखान सिंह दलित और वंचित समाज के लिए आवाज थे। सोशल मीडिया पर हजारों लोगों ने उन्हें नमन किया है। समाज में शोषितों की सशक्त आवाज थे। सोशल मीडिया पर लोगों ने कहा कि वह एक अपने आप में आंदोलन थे।

Death of poet Malkhan Singh, the indelible identity of Dalit voice and outrage | कवि मलखान सिंह का निधन, दलित आवाज और आक्रोश की अमिट पहचान थे

कवि मलखान सिंह का निधन, दलित आवाज और आक्रोश की अमिट पहचान थे

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Highlights30 सितंबर 1948 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में जन्म हुआ था। मलखान सिंह दलित और वंचित समाज के लिए आवाज थे।उनकी कुछ प्रमुख कृतियां हैं। सफेद हाथी, सुनो ब्राह्मण, एक पूरी उम्र, पूस का एक दिन, आजादी और ज्वालामुखी के मुहाने।

कवि मलखान सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे। शुक्रवार सुबह 4 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। कवि मलखान सिंह हिन्दी दलित कविता के महत्वपूर्ण स्तंभ थे। सुनो ब्राह्मण कविता संग्रह से उन्होंने दलित कविता की भाषा शिल्प और कहन को नया अंदाज दिया था।

30 सितंबर 1948 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में जन्म हुआ था। मलखान सिंह दलित और वंचित समाज के लिए आवाज थे। सोशल मीडिया पर हजारों लोगों ने उन्हें नमन किया है। समाज में शोषितों की सशक्त आवाज थे। सोशल मीडिया पर लोगों ने कहा कि वह एक अपने आप में आंदोलन थे।

उनका जाना सामाजिक न्याय की एक बुलंद आवाज का चले जाना है। सोशल मीडिया पर लोगों ने उन्हें क्रांतिकारी नमन किया है। उनकी कुछ प्रमुख कृतियां हैं। सफेद हाथी, सुनो ब्राह्मण, एक पूरी उम्र, पूस का एक दिन, आजादी और ज्वालामुखी के मुहाने। कथाकार कैलाश वानखड़े ने कहा कि कवि मलखान सिंह नहीं रहे। दलित आवाज और आक्रोश की अमिट पहचान। विनम्र आदरांजलि।

मलखान सिंह की प्रमुख कविताएं...

सुनो ब्राह्मण

हमारे पसीने से बू आती है, तुम्हें।
तुम, हमारे साथ आओ
चमड़ा पकाएंगे दोनों मिल-बैठकर।
शाम को थककर पसर जाओ धरती पर
सूँघो खुद को
बेटों को, बेटियों को
तभी जान पाओगे तुम
जीवन की गंध को
बलवती होती है जो
देह की गंध से।

सफेद हाथी

गाँव के दक्खिन में पोखर की पार से सटा, 
यह डोम पाड़ा है -
जो दूर से देखने में ठेठ मेंढ़क लगता है
और अन्दर घुसते ही सूअर की खुडारों में बदल जाता है।

यहाँ की कीच भरी गलियों में पसरी
पीली अलसाई धूप देख मुझे हर बार लगा है कि-
सूरज बीमार है या यहाँ का प्रत्येक बाशिन्दा
पीलिया से ग्रस्त है।
इसलिए उनके जवान चेहरों पर 
मौत से पहले का पीलापन 
और आँखों में ऊसर धरती का बौनापन
हर पल पसरा रहता है।
इस बदबूदार छत के नीचे जागते हुए
मुझे कई बार लगा है कि मेरी बस्ती के सभी लोग
अजगर के जबड़े में फंसे जि़न्दा रहने को छटपटा रहे है
और मै नगर की सड़कों पर कनकौए उड़ा रहा हूँ ।
कभी - कभी ऐसा भी लगा है कि
गाँव के चन्द चालाक लोगों ने लठैतों के बल पर
बस्ती के स्त्री पुरुष और बच्चों के पैरों के साथ
मेरे पैर भी सफेद हाथी की पूँछ से 
कस कर बाँध दिए है।
मदान्ध हाथी लदमद भाग रहा है
हमारे बदन गाँव की कंकरीली
गलियों में घिसटते हुए लहूलूहान हो रहे हैं।
हम रो रहे हैं / गिड़गिड़ा रहे है 
जिन्दा रहने की भीख माँग रहे हैं
गाँव तमाशा देख रहा है
और हाथी अपने खम्भे जैसे पैरों से 
हमारी पसलियाँ कुचल रहा है
मवेशियों को रौद रहा है, झोपडि़याँ जला रहा है
गर्भवती स्त्रियों की नाभि पर 
बन्दूक दाग रहा है और हमारे दूध-मुँहे बच्चों को 
लाल-लपलपाती लपटों में उछाल रहा है।
इससे पूर्व कि यह उत्सव कोई नया मोड़ ले
शाम थक चुकी है, 
हाथी देवालय के अहाते में आ पहुँचा है
साधक शंख फूंक रहा है / साधक मजीरा बजा रहा है
पुजारी मानस गा रहा है और बेदी की रज
हाथी के मस्तक पर लगा रहा है।
देवगण प्रसन्न हो रहे हैं
कलियर भैंसे की पीठ चढ़ यमराज
लाशों का निरीक्षण कर रहे हैं।
शब्बीरा नमाज पढ़ रहा है
देवताओं का प्रिय राजा मौत से बचे 
हम स्त्री-पुरूष और बच्चों को रियायतें बाँट रहा है
मरे हुओं को मुआवजा दे रहा है
लोकराज अमर रहे का निनाद
दिशाओं में गूंज रहा है...
अधेरा बढ़ता जा रहा है और हम अपनी लाशें 
अपने कन्धों पर टांगे संकरी बदबूदार गलियों में
भागे जा रहे हैं / हाँफे जा रहे हैं 
अँधेरा इतना गाढ़ा है कि अपना हाथ 
अपने ही हाथ को पहचानने में
बार-बार गच्चा खा रहा है।

एक पूरी उम्र

यक़ीन मानिए
इस आदमख़ोर गाँव में
मुझे डर लगता है
बहुत डर लगता है।

लगता है कि बस अभी
ठकुराइसी मेंढ़ चीख़ेगी
मैं अधसौंच ही
खेत से उठ जाऊँगा

कि अभी बस अभी
हवेली घुड़केगी
मैं बेगार में पकड़ा जाऊँगा

कि अभी बस अभी
महाजन आएगा
मेरी गाड़ी-सी भैंस
उधारी में खोल ले जाएगा

कि अभी बस अभी
बुलावा आएगा
खुलकर खाँसने के
अपराध में प्रधान
मुश्क बाँधकर मारेगा
लदवाएगा डकैती में
सीखचों के भीतर
उम्र भर सड़ाएगा।

Web Title: Death of poet Malkhan Singh, the indelible identity of Dalit voice and outrage

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