Coronavirus: Lockdown hits daily wage workers, rickshaw pullers | लॉकडाउन के चलते संघर्ष कर रहे दिहाड़ी मजदूर, रोजी-रोटी के अलावा सताने लगी परिवार की चिंता
लॉकडाउन के चलते संघर्ष कर रहे दिहाड़ी मजदूर, रोजी-रोटी के अलावा सताने लगी परिवार की चिंता

निर्माण कार्यों में लगे मजदूर, रेहड़ी-पटरी और खोमचे वाले और रिक्शा चलाने वाले श्रमिकों का एक बड़ा वर्ग है जो रोज कमाता है और रोज परिवार का पेट भरता है, लेकिन कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन (बंद) के बाद ऐसे लाखों दिहाड़ी मजदूरों के समक्ष रोजीरोटी का संकट खड़ा हो गया है।

कोविड-19 महामारी को और फैलने से रोकने की कोशिश में देश में तीन सप्ताह का बंद जारी है और पूरे देश की रफ्तार थम गयी है। लोग घरों में ही बंद हैं और उच्च तथा मध्यम वर्गीय परिवारों के सामने रोजी-रोटी को लेकर आर्थिक मोर्चे पर इतना बड़ा संकट भी नहीं है, लेकिन असंगठित क्षेत्र में काम करने वाला श्रमिक वर्ग इस बंदी से बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार देश में असंगठित क्षेत्र में करीब 42 करोड़ लोग काम करते हैं। इनमें खेतिहर मजदूर भी शामिल हैं। परिवार की रोजी-रोटी जुटाने के लिए एक बड़ा वर्ग गांव से दूर अपना घर बसाता है, लेकिन ऐसे कई सारे लोग अब सड़क और रेलगाड़ी बंद होने के चलते जहां तहां फंस गये हैं। उन्हें अपने साथ ही गांव में रह रहे परिजनों की भी चिंता सता रही है।

संकट के इन दिनों की गिनती कितनी होगी, कोई नहीं जानता। किसी को हालात से उबरने का सही वक्त नहीं पता। ऐसे में कई कहानियां हैं जो आंखें नम कर देती हैं। बिहार के बेगूसराय जिले के रहने वाले 22 साल के भूपेश कुमार को तब तो दिल्ली जैसे बड़े शहर की चकाचौंध ने कमाई करने की आस में लुभा लिया था लेकिन अब उसी राजधानी में वह अटके हुए हैं। न तो गांव में परिवार के पास जाना मुमकिन और ना ही कुछ कमाना ही संभव है।

बकौल भूपेश, ‘‘मैं स्नातक की पढ़ाई कर रहा था लेकिन करीब पांच महीने पहले दिल्ली आना पड़ा क्योंकि परिवार की माली हालत बहुत खराब है। मैं पलस्तर करना सीख रहा था। इतने दिनों में मुश्किल से ही कुछ कमा पाया हूं।’’

घरों की रंगाई पुताई का काम कराने वाले ठेकेदार अंजनि मिश्रा ने उनके लिए काम करने वाले पांच लोगों से घर वापस जाने को कहा है। कोलकाता में निर्माण क्षेत्र के श्रमिक मनोज बरीक का काम-धंधा इसी हफ्ते चला गया, जब उनकी कंपनी ने सारा कामकाज ही रोक दिया। वह 300 रुपये की दिहाड़ी से जैसे-तैसे तीन बच्चों समेत पांच सदस्यों के अपने परिवार का खर्च चला रहे थे लेकिन अब आगे क्या? सूझ नहीं रहा।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मंगलवार शाम असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों के लिए एक हजार रुपये की एकमुश्त सहायता की घोषणा की। बरीक और उनके जैसे अन्य मजदूरों के लिए यह मदद काफी तो नहीं है लेकिन वक्त पर उन तक पहुंच गयी तो थोड़ी राहत जरूर दे सकती है।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने सबसे पहले राज्य में करीब 35 लाख श्रमिकों के लिए एक-एक हजार रुपये की मदद का ऐलान किया था। वहीं 1.65 करोड़ निर्माण क्षेत्र के मजदूरों को एक महीने तक मुफ्त राशन दिये जाने की भी घोषणा की गयी।

हरियाणा सरकार ने इसी सप्ताह गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की मदद के लिए 1200 करोड़ रुपये प्रति माह के पैकेज का ऐलान किया था। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी ने राशन कार्ड धारकों, हॉकरों और ऑटो-रिक्शा चालकों के लिए 3000 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की है।

अन्य कई राज्य भी इस तरह की पहल कर रहे हैं। कुछ एनजीओ और निजी क्षेत्र के लोग भी संकटग्रस्त दैनिक वेतनभोगियों की मदद के लिए आगे आये हैं। सोशल मीडिया पर लोग एक दूसरे से अपने आसपास रहने वाले ऐसे गरीबों, वंचितों की भोजन आदि में मदद के लिए आग्रह कर रहे हैं।

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