chandra bhanu gupta birth anniversary biography congress up politics | जयंतीः जानिए कौन हैं UP की राजनीति के दिग्गज कांग्रेसी नेता चंद्रभानु, जिन्हें नेहरू नहीं करते थे पसंद  

नई दिल्ली, 14 जुलाईः उत्तर प्रदेश की राजनीति में चंद्रभानु गुप्ता का नाम एक अलग ही पहचान रखता है, जिसने कांग्रेस को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया था। उनका मानना था कि जो काम करो, वो हट कर करो। ऐसे नेता की आज जयंती है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के एक छोटे से गांव में 14 जुलाई, 1902 को हुआ था। चंद्रभानु 17 साल की उम्र में ही स्‍वतंत्रता के लिए चल रहे आंदोलन में शामिल हो गए थे और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की। वे सात दिसम्बर 1960 को पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद दो बार और मुख्यमंत्री रहे।

चंद्रभानु का राजनीतिक सफर

अगर चंद्रभानु गुप्ता के राजनीतिक सफर की बात करें तो उन्होंने इसकी शुरुआत 1926 में की थी। सबसे पहले उन्हें  उत्तर प्रदेश कांग्रेस और ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी का सदस्य बनाया गया था, जिसके बाद उन्होंने राजनीति में अपनी पहचान बनाई। इसके बाद चंद्रभानु 1937 के चुनाव में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए और फिर साल 1946, 1952, 1961, 1962, 1967 और 1969 में सूबे की विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए।

तीन बार बने यूपी के सीएम

भानुचंद्र 1946 में बनी पहली प्रदेश सरकार में गोविंदबल्लभ पंत के मंत्रिमंडल में पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी के रूप में सम्मिलित हुए थे। इसके बाद 1948 से लेकर 1959 तक कई विभागों के मंत्री रहे। वहीं, वे तीन बार उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री बनाए गए। पहली बार 1960 में वे यूपी के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद साल 1967 के चुनाव जीतने के बाद फिर से मुख्यमंत्री बने, लेकिन इस बार सिर्फ 19 दिनों के लिए सीएम बने। दरअसल, किसान नेता चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस को तोड़कर अपनी पार्टी बना ली थी और चंद्रभानु की सरकार गई थी। फिर चरण सिंह मुख्यमंत्री बन गए, लेकिन उनकी सरकार चल नहीं पाई और वो सरकार भी गिर गई। इसके बाद 1969 में चंद्रभानु गुप्ता को आनन-फानन में फिर से मुख्यमंत्री बनाया गया।

जवाहलाल नेहरू नहीं करते थे पसंद

बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में चंद्रभानु का बोलबाला था। उन्हें जनता बेहद पसंद करती थी। हालांकि उनकी इस सामाजिक लोकप्रियता को जवाहरलाल नेहरू पसंद नहीं करते थे। कहा जाता है कि यूपी कांग्रेस में उनका इतना दबदबा था कि विधायक पहले चंद्रभानु के सामने नतमस्तक होते थे, इसके बाद नेहरू के पास जाते थे। उनका यूपी की राजनीति में कद इतना बड़ा हो गया था कि मोरारजी देसाई की सरकार के मंत्रिमंडल में मंत्रि पद ऑफर किया गया था, लेकिन खराब स्वास्थ्य के कारण उन्होंने उसे लेने से इनकार कर दिया था। उनका निधन लखनऊ में 11 मार्च 1980 को हो गया था।

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