Bihar Patna Khuda Bakhsh Library why protest against plan to demolish some part of it | पटना में खुदा बख्श लाइब्रेरी के एक हिस्से को तोड़ने की योजना का क्यों हो रहा विरोध और क्या है इसका इतिहास, जानिए
पटना में खुदा बख्श लाइब्रेरी के एक हिस्से को तोड़ने की योजना पर विरोध (फाइल फोटो)

Highlightsपटना में सड़क चौड़ीकरण और फ्लाईओवर निर्माण के कारण खुदा बख्श लाइब्रेरी के एक हिस्से को तोड़ने की योजनापुरातत्वविदों और साहित्यकारों ने फैसले को असंवेदनशील बताते हुए इसका विरोध शुरू कर दिया हैकरीब 130 साल पुराना है खुदा बख्श लाइब्रेरी, महात्मा गांधी और राजेंद्र प्रसाद सहित कई बड़ी हस्तियों आ चुकी हैं यहां

पटना: बिहार की राजधानी पटना में सड़कों की बढ़ाई जा रही है चौड़ाई और पुलों के किये जा रहे निर्माण की भेंट कई ऐतिहासिक स्थलें चढ़ जा रही हैं. इसी कड़ी में सूबे का प्रतिष्ठित और यूनेस्को द्वारा हेरिटेज बिल्डिंग घोषित खुदा बख्श ओरिएंटल लाइब्रेरी के एक हिस्से पर टूटने का खतरा मंडराने लगा है. 

दरअसल, राजधानी पटना में मौर्यकालीन अशोक राजपथ पर फ्लाईओवर निर्माण में आड़े आ रहे खुदा बख्श लाइब्रेरी के 100 साल से भी ज्यादा पुराने वाचनालय को तोड़ने की योजना बन रही है. पुरातत्वविदों और साहित्यकारों ने हालांकि फैसले को असंवेदनशील बताते हुए इसका विरोध किया है. 

खुदा बख्श लाइब्रेरी का एक हिस्सा तोड़ने की योजना!

प्राप्त जानकारी के अनुसार खुदा बख्श लाइब्रेरी के निदेशक को पुल निर्माण निगम के तरफ से एनओसी देने के लिए नोटिस दिया गया है. बिहार राज्य का पथ निर्माण विभाग चाहता है कि कर्जन रीडिंग रूम के नाम से ख्याति प्राप्त 100 साल से अधिक पुराने वाचनालय को तोड़ दिया जाए, क्योंकि वह रीडिंग रूम प्रस्तावित फ्लाईओवर की राह में आडे आ रहा है. 

यह फ्लाईओवर पटना के सबसे ऐतिहासिक मार्ग अशोक राजपथ में बनने वाला है, जिसे मौर्यकालीन माना जाता है. प्रस्तावित नए एलिवेटेड कॉरिडोर को ऐतिहासिक गांधी मैदान के पास स्थित करगिल चौक को एनआईटी पटना और अंतत: गंगा नदी के तट के साथ बनने वाले 24 किलोमीटर लंबे महत्वाकांक्षी चार-लेन मार्ग से जोड़े जाने की योजना है. 

हालांकि इस प्रस्ताव को सरकार की मंजूरी मिलनी बाकी है. पुल निर्माण निगम के इस प्रस्ताव को नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने मंजूरी दे दी तो इस रीडिंग हॉल और लाइब्रेरी के कुछ हिस्सों का अस्तित्व खत्म हो सकता है.
 इसे लेकर खुदा बख्श लाइब्रेरी प्रशासन और कुछ साहित्यकारों ने सरकार से इसे टूटने से बचाने की गुहार लगाई है. 

ऐतिहासिक भवनों को तोड़ने की कोशिश के पहले भी आए मामले

इससे पहले राज्य सरकार ने एक अन्य ऐतिहासिक भवन को तोड़ेने का फैसला कर लिया था. यह भवन 17वीं सदी का बना हुआ था और इंडो डच आर्किटेक्ट का अप्रतिम उदाहरण माना जाता है. सरकार चाहती है कि इसे तोड़कर वहां पटना कलेक्ट्रेट का नया भवन तैयार करे. देश भर के धरोहर प्रेमियों और इतिहासकारों ने बिहार सरकार के इस फैसले का विरोध किया. 

खुद डच एम्बेसी की तरफ से बिहार सरकार से अनुरोध किया गया कि इंडो-डच आर्किटेक्ट की इस निशानी को रहने दिया जाए. बिहार सरकार हालांकि नहीं मानी. उस वक्त भी इंटेक और गांधी फाउंडेशन ने इसका विरोध किया था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस भवन को तोडने पर रोक लगा दी. 

इसी तरह एक विवाद तब खड़ा हुआ जब बिहार सरकार ने पटना में बिहार संग्रहालय के नाम से एक नया म्यूजियम तैयार किया और उस म्यूजियम में ऐतिहासिक पटना म्यूजियम की संरक्षित कलाकृतियों को लाकर रखना शुरू कर दिया.

पटना का खुदा बख्श लाइब्रेरी क्यों है खास

खुदाबख्श लाइब्रेरी के नाम से मशहूर इस पुस्तकालय में 21,000 से अधिक ऐतिहासिक महत्व के मैनुस्क्रिप्ट (पांडुलिपि) और ढाई लाख से अधिक किताबें हैं. जिनमें ज्यादातर अरबी और फारसी में हैं. लेकिन साथ ही 100 से अधिक संस्कृत में भी हैं. 

इसमें 2.5 लाख से अधिक किताबें हैं- उनमें से कुछ बहुत दुर्लभ हैं और यूनेस्को की मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर में भी इनका जिक्र है. ऐसा माना जाता है कि इस पुस्तकालय में इस्लामिक साहित्य से जुड़ा दुनिया का सबसे उत्कृष्ट कलेक्शन मौजूद है. 

यहां मौजूद चार पांडुलिपियों को नेशनल मिशन फॉर मैनुस्क्रिप्ट ने ‘विज्ञान निधि’ की उपाधि दी है. इस्लामिक साहित्य पर शोध करने वाले दुनिया भर के शोधार्थी अक्सर यहां आते हैं. 1891 में जब इसे खोला गया था तब खुदा बख्श लाइब्रेरी अपनी तरह की ऐसी पहली लाइब्रेरी थी, जिसमें आम लोग जा सकते थे. 

करीब 12 साल बाद भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन पटना में गंगा किनारे स्थित इस लाइब्रेरी का दौरा करने पहुंचे तो इसमें संग्रहित पांडुलिपियों को देखकर इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने इसके विकास के लिए धन उपलब्ध कराया. आभार जताने के लिए लाइब्रेरी की तरफ से 1905 में कर्जन रीडिंग हॉल की स्थापना की गई.

इतिहास के पन्ने समेटे खुदा बख्श लाइब्रेरी

पटना के अशोक राजपथ पर स्थित अपने अंदर इतिहास के पन्ने समेटे राष्ट्रीय धरोहर में शामिल खुदा बख्श ओरिएंटल लाइब्रेरी में महात्मा गांधी, राजेंद्र प्रसाद सहित देश की बड़ी-बड़ी हस्तियों ने अपने कदम रखे और इस धरोहर के महत्व को दुनिया को बताया. 

बताया जाता है कि लाइब्रेरी की स्थापना सीवान के शीर्ष जमींदार खानदान के सदस्य खान बहादुर मौलवी खुदा बख्श ने की थी. खुदा बख्श को अपने पिता से 1,400 पांडुलिपियां विरासत में मिली थीं और उन्होंने साधनहीन कुलीन लोगों से ऐसी और तमाम पांडुलिपियां जुटाने के लिए अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा उपमहाद्वीप की यात्रा में गुजार दिया. 

उन्होंने एक ट्रस्ट के जरिये इन्हें लोगों को समर्पित करने से पहले लगभग 4,000 पांडुलिपियां एकत्र कर ली थीं. 1969 में भारत सरकार ने संसद में पारित एक विधेयक के जरिये खुदा बख्श लाइब्रेरी को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के तौर पर मान्यता दी. 

मुगल-ए-आजम फिल्म से भी खुदा बख्स लाइब्रेरी का कनेक्शन

यह लाइब्रेरी केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की तरफ से वित्त पोषित है. इसकी बेशकीमती विरासत में अमोरनामा की एकमात्र प्रति भी है, जो 16वीं शताब्दी में बनी मिनिएचर पेंटिंग का एक संग्रह है और इस पर मुगल बादशाह शाहजहां की मुहर है. यहां 14वीं सदी के ख्यात शायर हाफिज का एक दुर्लभ संग्रह भी है, जिनकी कुछ पंक्तियों को क्लासिक हिंदी फिल्म मुगल-ए-आज़म में लिया गया था. 

इस लाइब्रेरी में मानव और पशुओं की शल्य चिकित्सा पर 12वीं शताब्दी की एक किताब भी है, जिसे स्पेन की एक लाइब्रेरी से हासिल किया गया था और हर्बल पौधों के लाभ बताने वाली 15वीं शताब्दी की एक पांडुलिपि भी है.

जानकारों के अनुसार इसने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू जैसे प्रतिष्ठित मेहमानों की मेजबानी की है और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भी यहां आने वाले लोगों में शामिल थे. इसके अलावा दर्जनों राजदूत, विदेशी गणमान्य व्यक्ति समय-समय पर यहां आते रहते हैं. 

खुद बख्श लाइब्रेरी का भविष्य क्या होगा?

खुदा बख्श लाइब्रेरी की निदेशक डॉक्टर साहिस्ता बेदार ने बताया कि मुख्य भवन को टच नहीं किया जा रहा है, लेकिन मुख्य भवन का जो पूरा एरिया है, बाउंड्री यहां तक आ जाएगी. लाइब्रेरी का लुक खराब हो जाएगा और ये पुल के नीचे आ जाएगी, तो आप समझ सकते हैं. ये कर्जन रीडिंग रूम हेरिटिज बिल्डिंग है. 

ऐसे में लाइब्रेरी की निदेशक सहित कई साहित्यिक संस्थाओं ने इसका विरोध किया है. निदेशक ने पटना के जिलाधिकारी को इस रास्ते को बदलकर दूसरे रास्ते से पुल निर्माण की मांग की है और साथ ही चार अल्टरनेटिव रास्ते भी उन्होंने जिला प्रसाशन को सुझाए हैं. जिसमें पहला रास्ता कारगिल चौक से कलेक्ट्रेट होते हुए गंगा एक्सप्रेस वे पर मिलाने का है तो दूसरा रास्ता कारगिल चौक से बीएन कॉलेज होते हुए गंगा एक्सप्रेसवे से जोडने का है. 

वहीं, तीसरा रास्ता कारगिल चौक से पीएमसीएच के मुख्य द्वार से घुमा कर पीएमसीएच के अंदर से साइंस कॉलेज के तरफ निकालने का है.

हालांकि, पटना जिलाधिकारी भले ही यह कह रहे हों कि इस निर्माण से लाइब्रेरी को कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा. लेकिन बिहार के साहित्य से जुडे लोग इसे राष्ट्रीय धरोहर पर चोट करने से जोडकर देख रहे हैं. 

साहित्यकारों का कहना है कि खुदा बख्श लाइब्रेरी में हजारों पांडुलिपियों और अलग-अलग धर्मों के कई ग्रंथ को सहेज कर रखा गया है, ऐसे में जरूरी इस बात की है कि कोई ऐसा रास्ता निकाला जाए, जिससे इस धरोहर को भी क्षति ना हो और विकास का रास्ता भी अवरुद्ध ना हो. 

वहीं, खुदा बख्श लाइब्रेरी के पूर्व निदेशक और पटना विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर डॉ. इम्तियाज अहमद ने कहा कि उन्हें इस बात की हैरानी है कि हमारी विरासत को ध्वस्त करने का ऐसा प्रस्ताव पेश किया गया है. अहमद अब भी लाइब्रेरी की गवर्निंग बॉडी में शामिल है, जिसके पदेन अध्यक्ष बिहार के राज्यपाल हैं. 

इस बीच मामला सामने आने के बाद जब राज्यपाल, जो इस लाइब्रेरी के बोर्ड के मुखिया हैं, उन्होंने राज्य सरकार और पटना के जिलाधिकारी को इसका विकल्प ढूंढने की सलाह दी तो जिला प्रशासन ने इसपर सफाई दी है. 

पटना के जिलाधिकारी चंद्रशेखर सिंह ने कहा कि अभी फाइनल डिसिजन नहीं हैं. प्रोजेक्ट तो फाइनल हुआ है. लेकिन एनओसी मांगी गई है और एनओसी मिलने पर ही काम शुरू होगा. जबर्दस्ती काम शुरू होने का कोई औचित्य नहीं है और उसी पर चर्चा चल रही है.

Web Title: Bihar Patna Khuda Bakhsh Library why protest against plan to demolish some part of it

भारत से जुड़ी हिंदी खबरों और देश दुनिया खबरों के लिए यहाँ क्लिक करे. यूट्यूब चैनल यहाँ इब करें और देखें हमारा एक्सक्लूसिव वीडियो कंटेंट. सोशल से जुड़ने के लिए हमारा लाइक करे