Reserve Bank of India is required for the country | देश के लिए जरूरी है रिजर्व बैंक की आजादी
देश के लिए जरूरी है रिजर्व बैंक की आजादी

(लेखक-विकास मिश्र)
बहुत पहले शादी-ब्याह के कार्यक्रमों में घर मालिक जरूरी सामान लाकर भंडार में रख देता था. इसके बाद वह एक ऐसे व्यक्ति को भंडार का इंचार्ज बनाता था जो सख्त हो और अपने विवेक के अनुसार जरूरी सामान जारी करे. यदि घर मालिक सामान मांगने आए तो उससे भी सवाल कर सके कि सामान इतना क्यों चाहिए? ऐसे व्यक्ति को इंचार्ज बनाने का उद्देश्य यही होता था कि खर्च जरूरत के अनुसार हो और भंडार में किसी चीज की कमी न हो. प्रबंधन का दरअसल यही सबसे बेहतर तरीका है. कंपनियां भी वैसे ही फाइनांस कंट्रोलर को पसंद करती हैं जो सही और सटीक बोले तथा कंपनी की आर्थिक स्थिति के अनुरूप निर्णय ले. यदि देश के स्तर पर देखें तो यह भूमिका रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की है कि देश की आर्थिक स्थिति कैसे ठीक रहे. इसलिए ऐसी व्यवस्था की गई कि सामान्य स्थितियों में रिजर्व बैंक सरकार के नियंत्रण से बाहर रहे.

उसे कामकाज करने की आजादी हो ताकि देश का वित्तीय स्वास्थ्य बेहतर बना रहे. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का गठन अविभाजित भारत में 1935 में हुआ और आजादी के बाद 1 जनवरी 1949 में इसका राष्ट्रीयकरण हुआ. तब से लेकर कभी भी केंद्र सरकार ने रिजर्व बैंक के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं किया. यहां तक कि भारतीय अर्थव्यवस्था 1991 में जब बड़ी गंभीर स्थिति से गुजर रही थी और 2008 में जब पूरी दुनिया मंदी के दौर में थी, तब भी सरकार ने रिजर्व बैंक को नहीं छेड़ा. सरकारें यह मानती रही हैं कि रिजर्व बैंक में बिठाए जाने वाले लोग वित्तीय क्षेत्र के धुरंधर होते हैं और अपनी योग्यता तथा भविष्य को समझ पाने की क्षमता से वे देश को बेहतर वित्तीय स्थिति में रखते हैं. 

सामान्य तौर पर रिजर्व बैंक को कामकाज में आजादी रहती है लेकिन आरबीआई एक्ट के सेक्शन 7 के तहत सरकार को यह अधिकार है कि वह रिजर्व बैंक के गवर्नर को निर्देश दे सकती है. पिछले महीने जब यह खबर सामने आई कि केंद्र सरकार ने रिजर्व बैंक के गवर्नर को सेक्शन 7 के तहत पत्र भेजा है तो पूरे देश में खलबली मच गई. इसे रिजर्व बैंक की आजादी पर हमले के रूप में देखा गया. यह भी बात उभर कर सामने आई कि सरकार कुछ मसलों पर रिजर्व बैंक पर दबाव बना रही है. रिजर्व बैंक के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इसका विरोध किया. आरबीआई की कर्मचारी यूनियन ने आरोप लगाया कि  सरकार बैंक की स्वायत्तता को खतरा पहुंचा रही है.

 इस दौरान रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने जिस साहस का परिचय दिया और सरकार के सामने झुकने से इनकार कर दिया, उसकी सबने तारीफ की. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पटेल के समर्थन में ट्वीट किया, ‘यह अच्छा है कि आखिरकार पटेल आरबीआई को  मिस्टर 56  से बचा रहे हैं. कभी नहीं से विलंब बेहतर, भारत भाजपा/आरएसएस को हमारी संस्थाओं पर कब्जा नहीं करने देगा.’
रिजर्व बैंक से सरकार की नाराजगी के कई कारण बताए जा रहे हैं. इसमें एक यह है कि सरकार चाहती है कि कुछ खास बैंकों पर आरबीआई सख्ती न बरते. पावर कंपनियों के लोन को एनपीए घोषित करने में रियायत बरती जाए. इसके अलावा एक बात यह भी आई कि सरकार यह चाहती है कि रिजर्व बैंक उसे 3.6 लाख करोड़ रुपए दे.

हालांकि कई दिनों के बाद शुक्रवार को वित्त मंत्रलय की तरफ से यह बयान आ गया कि सरकार कोई पैसा नहीं चाहती है. यह माना जा रहा है कि रिजर्व बैंक की दृढ़ता की वजह से सरकार को झुकना पड़ा है और वित्त मंत्रलय को इस तरह का बयान जारी करना पड़ा. केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक के बीच किसी मुद्दे पर टकराव कोई नई बात नहीं है लेकिन सरकारें कभी आक्रामक नहीं होती हैं.

पटेल से पहले पूर्व गवर्नर रघुराम राजन को भी  एनपीए, मैनेजमेंट और नोटबंदी जैसे मुद्दों पर सरकार से टकराव का सामना करना पड़ा था. ताजा मुद्दे पर रघुराम राजन ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में बड़ी अच्छी बात कही. उन्होंने कहा कि आरबीआई सरकार की एक एजेंसी है, लेकिन इसे कुछ खास कर्तव्य सौंपा गया है. उन्हें एक दूसरे के अधिकार क्षेत्न का ध्यान रखना पड़ेगा और जब इसमें दखलंदाजी होगी तो समस्या होगी. उम्मीद है कि आरबीआई के अधिकार क्षेत्न का सम्मान होगा. रिजर्व बैंक ड्राइविंग सीट पर बैठी केंद्र सरकार के लिए सीट बेल्ट है. फैसला सरकार को करना है कि वह सीट बेल्ट पहने या न पहने! सीट बेल्ट पहनने से दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से बचाव में सहायता मिलती है. मैं राजन की इस बात से पूरी तरह सहमत हूं. मुङो लगता है कि देश की बेहतर आर्थिक सेहत के लिए रिजर्व बैंक का आजाद रहना जरूरी है. 
 


Web Title: Reserve Bank of India is required for the country
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