Vijay Darda's blog: why the United Nations has become the favorable of some countries? | विजय दर्डा का ब्लॉगः कुछ देशों की जागीर क्यों बन गया है संयुक्त राष्ट्र? 
विजय दर्डा का ब्लॉगः कुछ देशों की जागीर क्यों बन गया है संयुक्त राष्ट्र? 

विजय दर्डा

संयुक्त राष्ट्र महासभा के 73वें सत्र को संबोधित करते हुए भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कड़वी लेकिन बिल्कुल सही बात की है कि संयुक्त राष्ट्र ने खुद को यदि नहीं सुधारा तो उसके अप्रासंगिक हो जाने का खतरा है। सुषमा ने कहा- ‘मैं संयुक्त राष्ट्र की विशिष्ट और सकारात्मक भूमिका को रेखांकित करते हुए अपनी बात शुरू करती हूं लेकिन मुङो यह अवश्य कहना होगा कि कदम दर कदम इस संस्था के महत्व, प्रभाव, सम्मान और मूल्यों में अवनति (गिरावट) शुरू हो रही है।’
 
सुषमा स्वराज ने वास्तव में संयुक्त राष्ट्र को आईना दिखाया है लेकिन दिक्कत यह है कि संयुक्त राष्ट्र अपनी तस्वीर की हकीकत को देखना ही नहीं चाह रहा है। इसका कारण यह है कि विश्व के 193 देशों का यह संगठन वास्तव में कुछ खास देशों की जागीर बन कर रह गया है। वे जैसा चाहते हैं, संयुक्त राष्ट्र वैसा ही फरमान सुनाता है। सारी शक्ति संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्यों अमेरिका, यूके, रूस, फ्रांस और चीन के पास सिमटी हुई है। बदलते रहने वाले 10 अस्थायी सदस्यों और संयुक्त राष्ट्र के सामान्य सदस्य देशों की यहां कोई वकत ही नहीं। सुरक्षा परिषद के पांच देशों के पास वीटो का अधिकार है। वीटो, लातिनी भाषा का शब्द है जिसका मतलब है,  ‘मैं मना करता हूं’। वीटो का यह अधिकार उन्हें मनमर्जी की इजाजत देता है। 

अक्तूबर 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी तब दूसरा विश्व युद्ध समाप्त ही हुआ था और उस समय के विजेता राष्ट्रों की इसमें बड़ी भूमिका थी। आज के सदस्य देशों में से बहुत से गुलाम ही थे। इसलिए पांच बड़े राष्ट्रों ने भविष्य में अपनी बादशाहत को कायम रखने की दृष्टि से ‘वीटो’ का प्रावधान रख दिया। यही वीटो दूसरे देशों के लिए घातक साबित हुआ है। इसके कारण संयुक्त राष्ट्र की प्रतिष्ठा उन देशों में गिरती जा रही है जिनकी बात सुनी नहीं जाती है। सीधे शब्दों में कहें तो संयुक्त राष्ट्र पक्षपाती नजर आता है। 

दुनिया के बहुत से देश यह महसूस करते हैं कि भारत जैसे बड़े राष्ट्र को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जगह मिलनी ही चाहिए लेकिन चीन जैसे स्थायी सदस्य के कारण भारत को सफलता नहीं मिल पाती है। इतना ही नहीं अजहर मसूद जैसे आतंकवादी के पक्ष में भी चीन खड़ा हो जाता है और भारत कुछ नहीं कर पाता। यह स्थिति तब है जब सुरक्षा परिषद में सात बार अस्थायी सदस्य रहने वाले भारत ने संयुक्त राष्ट्र के करीब-करीब हर शांति अभियान में बढ़ चढ़ कर सहयोग दिया है। भारतीय सशस्त्र बलों के 1 लाख 70 हजार से ज्यादा जवानों ने शांति अभियानों में शिरकत की है और 160 से ज्यादा जवानों ने बलिदान दिया है। क्या इन बलिदानों का कोई मोल नहीं है?

1980 के बाद से यह मांग लगातार उठती रही है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का विस्तार होना चाहिए और जरूरी सुधार भी होने चाहिए, लेकिन स्थायी सदस्य देशों की पक्षपातपूर्ण राजनीति ऐसा होने नहीं दे रही है। गल्फ वार के दौरान हम देख चुके हैं कि अमेरिका किस तरह से संयुक्त राष्ट्र को अपनी उंगलियों पर नचाता है। दरअसल हर स्थायी सदस्य देश केवल अपने हितों के बारे में सोचता है। 

दुनिया के हित की चिंता इनमें से किसी को नहीं है। हालांकि दुनिया को दिखाने के लिए अमेरिका और रूस ने भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने की वकालत की है लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकला है। वैसे भारत के साथ जर्मनी, ब्राजील और जापान ने एक जी-4 गुट बना रखा है जो सुरक्षा परिषद में सदस्यता की मांग कर रहा है। इधर फ्रांस चाहता है कि दक्षिण अफ्रीका को सदस्यता मिले। इसके साथ ही अफ्रीकी देशों का एक गुट सी-10 है जो दावा ठोंक रहा है कि किसी अफ्रीकी देश को स्थायी  सदस्यता दी जाए। अफ्रीकी देशों के दावे में भी दम है क्योंकि सुरक्षा परिषद का 75 प्रतिशत काम अफ्रीकी महादेश में ही चल रहा है। 

73वें सम्मेलन में सुषमा स्वराज ने वास्तव में संयुक्त राष्ट्र के भविष्य को रेखांकित कर दिया है। यदि इतना प्रमुख संगठन अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता नहीं लाता है और दुनिया यह महसूस नहीं करती है तो धीरे-धीरे ऐसे देश संयुक्त राष्ट्र की अवहेलना शुरू कर देंगे। आखिर पक्षपात को कोई कब तक बर्दाश्त करेगा? 

बड़े सधे हुए शब्दों में भारत ने अपनी भावनाओं से संयुक्त राष्ट्र को चेतावनी दे दी है। अब यह संयुक्त राष्ट्र पर निर्भर करता है कि वह अपनी महत्ता बनाए रखना चाहता है या फिर कुछ खास देशों की जागीर के रूप में अपनी पहचान को ही बनाए रखता है। इतना तो तय है कि यदि संयुक्त राष्ट्र ने खुद को नहीं सुधारा तो आने वाला कल उसके लिए उज्‍जवल नहीं होगा। निश्चित रूप से इसका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना होगा क्योंकि संयुक्त राष्ट्र का गठन शांति और विकास की बड़ी उम्मीदों के साथ हुआ था। उम्मीदें पूरी होनी चाहिए।


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