रूस-यूक्रेन युद्ध: यूरोप, अमेरिका पर भारी पड़ रहे उन्हीं के प्रतिबंध

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Published: August 1, 2022 02:45 PM2022-08-01T14:45:43+5:302022-08-01T14:47:32+5:30

रूस दुनिया में गैस और कच्चे तेल का बड़ा आपूर्तिकर्ता है. दुनिया में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति में रूस का दबदबा है. वो पेट्रोलियम पदार्थों का सबसे बड़ा और कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश है.

Russia Ukraine war restrictions by Europe, America on Russia seems not fruitfull for them | रूस-यूक्रेन युद्ध: यूरोप, अमेरिका पर भारी पड़ रहे उन्हीं के प्रतिबंध

यूरोप, अमेरिका पर भारी पड़ रहे उन्हीं के प्रतिबंध

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अश्विनी महाजन

फरवरी 2022 से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध के दुष्परिणाम आज पूरी दुनिया भुगत रही है. गौरतलब है कि यूक्रेन द्वारा नाटो से पींगें बढ़ाने से नाराज रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण कर दिया था, जिससे यूक्रेन में तो भारी जान-माल का नुकसान हुआ ही, उस युद्ध से उपजी वैश्विक आर्थिक समस्याओं से निजात निकट भविष्य में दिखाई नहीं दे रहा. 

तेल की बढ़ती कीमतें, आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाएं, खाद्यान्न की कमी और उसके कारण सभी मुल्कों में प्रभावित होती ग्रोथ और बढ़ती कीमतों ने दुनिया के हर आदमी को प्रभावित किया है.

अमेरिका और उसके मित्र यूरोपीय देशों द्वारा रूस को सबक सिखाने के उद्देश्य से आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए. अमेरिका का मानना था कि इन प्रतिबंधों के कारण रूसी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी. रूसी अर्थव्यवस्था तो ध्वस्त नहीं हुई लेकिन इन प्रतिबंधों का खासा असर पश्चिम के देशों पर देखने को जरूर मिल रहा है. 

गौरतलब है कि रूस दुनिया में गैस और कच्चे तेल का बड़ा आपूर्तिकर्ता है. दुनिया में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति में रूस का दबदबा है. वो पेट्रोलियम पदार्थों का सबसे बड़ा और कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश है. अमेरिका और यूरोप के देशों ने रूस को अपनी भुगतान प्रणाली ‘स्विफ्ट’ से प्रतिबंधित कर दिया. अमेरिका की योजना यह थी कि ऐसे में रूस अपने तेल को नहीं बेच पाएगा, जिससे उसकी वित्तीय रीढ़ टूट जाएगी. लेकिन रूस की रणनीति ने अमेरिका की अपेक्षाओं पर पानी फेर दिया और आज अमेरिका और उसके मित्र यूरोपीय देश भारी आर्थिक संकट में आते दिखाई दे रहे हैं.

यह समझते हुए कि दुनिया में बढ़ती तेल कीमतों के कारण यूरोप समेत सभी देश सस्ते तेल की खोज में रूस की शरण में ही आएंगे, एक तरफ रूस ने अपने तेल की आपूर्ति भारत को सस्ते दामों पर और रुपए में करना शुरू कर दिया और भारत ने रूस से तेल आयात 50 गुना बढ़ा दिया. दूसरी तरफ उसे यूरोपीय देशों से तेल भुगतानों में कोई बाधा नहीं आई. यूरोपीय देश चूंकि रूस से सस्ते तेल पर निर्भर हो रहे थे, उन्होंने स्वयं के प्रतिबंधों को ही दरकिनार करते हुए रूस से तेल खरीदना जारी रखा. 

ऐसे में रूस की अर्थव्यवस्था पर इन प्रतिबंधों का असर न्यूनतम पड़ा. उसके बाद यूरोपीय देशों द्वारा आर्थिक प्रतिबंधों को जारी रखने से नाराज रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने इन मुल्कों को तेल की आपूर्ति कम करने का निर्णय ले लिया. जर्मनी, जो यूरोपीय देशों में पिछले कुछ दशकों से आर्थिक संकटों से अभी तक अप्रभावित था, अब रूस की रणनीति के चलते वह भी तेल की कमी की चपेट में आ गया. 

इसका स्वभाविक असर जर्मनी में बिजली उत्पादन पर पड़ा. वहां बिजली उत्पादन की लागत ही नहीं बढ़ी है, बिजली की आपूर्ति भी संकट में आ गई. यूरोप के अन्य देश भी आज गैस और कच्चे तेल की आपूर्ति की बाधाओं के चलते संकट में हैं. आगे आने वाले समय में जब शीतकाल बहुत नजदीक है, यूरोपीय देशों की सरकारों का चितिंत होना स्वभाविक ही है.  

यूरोप को नहीं भूलना चाहिए कि उसने स्वयं रूस को वैश्विक वित्तीय नेटवर्क से अलग करने, रूसी उत्पादों पर भारी टैक्स लगाने के साथ-साथ रूसी सामानों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगा कर, तेल निर्यातों की श्रृंखला को ध्वस्त करने, रूस के बैंकों, वित्तीय संस्थानों, व्यवसायों और सरकारी उद्यमों पर आक्रमण का काम किया है. ऐसे में वे देश रूसी राष्ट्रपति से कोई सहयोग और सहायता की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? 

Web Title: Russia Ukraine war restrictions by Europe, America on Russia seems not fruitfull for them

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