Pak isolated in the world | दुनिया में अलग-थलग पड़ता पाकिस्तान

लेखक- अवधेश कुमार
‘द फाइनेंशल एक्शन टास्क फोर्स’ यानी एफएटीएफ द्वारा पाकिस्तान को ग्रे यानी संदिग्धों की सूची में डाले जाने के बाद चीन को छोड़कर कोई देश उसके साथ नहीं आया। इससे पता चलता है कि दुनिया में पाकिस्तान की कैसी छवि है। वस्तुत: एफएटीएफ ने यह कदम इसलिए उठाया है क्योंकि पाकिस्तान उसके सामने इस बात का विश्वसनीय साक्ष्य नहीं दे पाया कि उसने अपने देश में आतंकवाद का वित्तपोषण रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठाए हैं।

पाकिस्तान का इस पर बौखलाना स्वाभाविक है। पाकिस्तानी विदेश मंत्नालय ने कहा कि यह राजनीति से प्रेरित फैसला है और इसका आतंक के खिलाफ पाकिस्तान की कार्रवाई से कोई लेनादेना नहीं है। पाकिस्तान के गृह मंत्नी मोहम्मद आजम ने कहा कि एफएटीएफ पर अमेरिका और भारत का अत्यधिक दबाव है। इन देशों ने चीन और सऊदी अरब पर भी दबाव डाला कि वे पाकिस्तान की मदद न करें और न ही इस मामले में कोई हस्तक्षेप करें। पाकिस्तान की इन प्रतिक्रियाओं का मतलब यही है कि उसने इन देशों के सहयोग से बच जाने की उम्मीद की थी जो पूरी नहीं हुई। हालांकि चीनी विदेश मंत्नालय के प्रवक्ता लू कांग ने एफएटीएफ के फैसले के बाद कहा कि आतंकवाद से निपटने में पाकिस्तान के प्रयासों की अनदेखी नहीं की जा सकती है। उनके अनुसार आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान ने सदैव अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का साथ दिया है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को पाक पर भरोसा करना चाहिए। 

चीन के इस बयान से पाकिस्तान को राहत मिल सकती है, क्योंकि एक बड़ा देश तो उसके साथ खड़ा है। हालांकि इसके पीछे भी चीन का अपना स्वार्थ ज्यादा है। वह जिस तरह पाकिस्तान में निवेश कर रहा है उसमें वह उसके खिलाफ नहीं जा सकता है। किंतु तत्काल इससे स्थिति में कोई अंतर नहीं आने वाला। एफएटीएफ पेरिस स्थित अंतरसरकारी संस्था है जिसका गठन 1989 में किया गया था। इसका काम गैर-कानूनी आर्थिक मदद को रोकने के लिए नियम बनाना है। यह आतंकवादी वित्त पोषण को रोकने के लिए काम नहीं करने वाले उच्च खतरे वाले देशों की सूची तैयार करता है। एफएटीएफ की ग्रे या काली सूची में डाले जाने का मुख्य प्रभाव संबंधित देश की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। हालांकि पाकिस्तान काली सूची में जाने से बच गया है किंतु ग्रे सूची में आना भी सामान्य झटका नहीं है।

पाकिस्तान के खिलाफ यह प्रक्रिया फरवरी 2018 में शुरू हुई थी जब एफएटीएफ ने अपने अंतर्राष्ट्रीय सहयोग समीक्षा समूह के तहत निगरानी के पाकिस्तान के नामांकन को मंजूरी दी थी। इसे ही ग्रे सूची के नाम से जाना जाता है। पाकिस्तान ने जितना संभव था उतना कूटनीतिक प्रयास किया ताकि किसी तरह 37 सदस्य देशों वाली यह संस्था उसके खिलाफ फैसला न करे। पाकिस्तान की ओर से 15 महीनों की एक कार्ययोजना रखी गई और बताया गया कि उसके यहां मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादियों के धन का रास्ता बंद करने के क्या उपाय किए गए हैं। ध्यान रखिए एफएटीएफ ने पाकिस्तान को 26 सूत्नी कार्ययोजना सौंपी थी। उसमें साफ कहा गया था कि अगर वह इसे अमल में लाने का विश्वास दिला देता है तो कार्रवाई से बच सकता है। जाहिर है, वह ऐसा विश्वास दिलाने में सफल नहीं रहा। आज की स्थिति में कहा जा सकता है कि एफएटीफ जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था ने दुनिया को यह संदेश दे दिया है कि पाकिस्तान में आतंकवादियों को वित्तीय सहायता मिलती है तथा वहां हवाला कारोबार भी होता है। 

पाकिस्तान को यहां तक पहुंचाने में भारत की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 2015 में इस सूची से पाकिस्तान को निकाले जाने के बाद से ही भारत सक्रिय हो गया था। भारत ने अक्तूबर 2016 में एफएटीएफ में पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों को मिल रही वित्तीय सहायता का मुद्दा पूरे प्रभावी ढंग से उठाया था।  पाकिस्तान की कोशिश थी कि इस मुद्दे को तकनीकी पहलुओं में उलझा दिया जाए। लेकिन अमेरिका और यूरोपीय देश भारत के साथ खड़े हुए और पाकिस्तान अपनी रणनीति में सफल नहीं हो सका। इस तरह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान को ग्रे सूची में डाला जाना भारत की स्पष्ट कूटनीतिक सफलता है।