Korea's Ayodhya connection | द. कोरिया का ‘अयोध्या’ कनेक्शन

लेखक-शोभना जैन  
दक्षिण कोरिया और भारत के बढ़ते रिश्तों का गहरा ‘अयोध्या कनेक्शन’ भी है। कुछ वर्ष पूर्व राजधानी दिल्ली में नियुक्त एक वरिष्ठ  कोरियाई राजनयिक ने जब  बताया कि उनके तथा उनके पुरखों के रक्त में कोरिया के एक पूर्व राजा के साथ-साथ उस महाराजा की महारानी बनी, अयोध्या की एक राजकुमारी सूरिरत्ना का रक्त भी बहता है तो हैरानी हुई इस अयोध्या कनेक्शन पर। राजनयिक के अनुसार इतिहास के पन्नों में यह तथ्य दर्ज है। हंसते हुए उन्होंने बताया कि उन जैसे काफी  कोरियाई लोगों की नसों में कोरियाई राजा और अयोध्या की  राजकुमारी जो बाद में कोरिया की महारानी बनी, हियो ह्वांग ओक  का रक्त बहता है और अपने भारतीय दोस्तों को यह बात बताते हुए उन्हें लगता है कि उनका नाता तो हजारों वर्ष पुराना है। 

इसी राजकुमारी की याद में अब दक्षिण कोरिया सरकार व उत्तर प्रदेश सरकार एक साथ मिल कर अयोध्या में एक स्मारक संग्रहालय बना रहे हैं। भौगोलिक दृष्टि से भले ही दोनों देशों के बीच दूरी रही हो लेकिन  भारत दौरे पर आए दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन ने भी विशेष तौर पर इस अयोध्या कनेक्शन की चर्चा की। बहरहाल 2000 पूर्व दक्षिण कोरिया में ब्याही  अयोध्या की  राजकुमारी और बाद में बौद्ध धर्म की साझी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक डोर से बंधे इन रिश्तों से आगे बढ़ कर अगर आज के दौर की बात करें तो निश्चय ही कोरियाई राष्ट्रपति मून जे-इन की भारत यात्ना ऐसे वक्त हुई जबकि कोरिया प्रायद्वीप में  तेजी से बदल रहे समीकरणों के चलते उत्तर-पूर्व एशिया की भू राजनैतिक स्थिति एक नया रूप ले रही है। पिछले कुछ वर्षो से दोनों देशों के बीच प्रगाढ़ व्यापारिक रिश्तों के अलावा संबंधों का दायरा बढ़ा कर ‘सामरिक साङोदारी’, सांस्कृतिक और दोनों देशों की जनता के  बीच आपसी संपर्क बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून के अनथक प्रयासों से हुई अमेरिका-उत्तर कोरिया शिखर वार्ता की सफलता के बाद अब अमेरिका, चीन सहित दुनिया भर की निगाहें इस समझौते के सफल क्रियान्वयन पर टिकी हैं, चीन इस क्षेत्न में भी लगातार अपना दबदबा बना रहा है, अमेरिका-चीन युद्ध के काले बादल मंडरा ही रहे हैं। ऐसे में भारत और कोरिया दोनों का ही प्रयास है कि आपसी हित के मुद्दों पर दोनों देश आपसी सहयोग से निबटें। दरअसल 2015 में प्रधानमंत्नी मोदी की कोरिया गणराज्य यात्ना के दौरान दोनों देशों ने अपने उभयपक्षीय संबंधों के   दायरे को बढ़ाकर विशेष सामरिक साङोदारी करने पर अपनी सहमति       जताई थी।
 हाल की मून की भारत यात्ना के दौरान हुई मोदी-मून शिखर वार्ता के बाद ‘विशेष रणनीतिक साङोदारी’ के दूसरे चरण के शुरू होने की उम्मीद है। निश्चय ही मोदी की ‘एक्ट ईस्ट’ और मून की ‘नई दक्षिण नीति’ ने  उभयपक्षीय संबंधों का दायरा और व्यापक किया है। गत नवंबर में राष्ट्रपति मून के नई दक्षिण नीति की घोषणा करने के साथ ही भारत-दक्षिण कोरिया के रिश्ते में एक नए चरण की शुरुआत हुई है। कोरिया प्रायद्वीप में दोनों देशों के शांति प्रयासों के साथ भारत प्रशांत क्षेत्न की भौगोलिक स्थिति से दोनों देश नजदीक से जुड़े हुए हैं। ऐसे ही अन्य क्षेत्नीय और वैश्विक महत्व के विभिन्न मुद्दों पर दोनों देशों के बीच आपसी समझ निरंतर बढ़ रही है और दोनों मिल कर अनेक क्षेत्नों में काम कर  रहे हैं। पिछले वर्ष  राष्ट्रपति पद के चुनाव प्रचार के दौरान मून ने अपने देश की परंपरागत विदेश नीति से हट कर ऐलान किया कि द। कोरिया भारत के साथ दुनिया की चार महाशक्तियों अमेरिका, रूस, चीन और जापान जैसे संबंध रखेगा। कोरिया प्रायद्वीप में अगर शांति प्रयासों की बात करें तो भारत हमेशा बातचीत के जरिए कोरियाई प्रायद्वीप के परमाणु निरस्त्नीकरण की वकालत करता रहा है। और दक्षिण कोरिया भी इन वर्षो में यही बात करता रहा है। दूसरी तरफ किम जोंग के उत्तर कोरिया के साथ भी भारत के लगातार संबंध बनाए रखने का फायदा भारत-दक्षिण कोरिया की बढ़ती दोस्ती को मिलेगा।

दोनों देश अपने व्यापारिक रिश्ते एक दूसरे के पूरक बनाने की मुहिम में  हैं। दक्षिण कोरिया के पास उन्नत तकनीक और विशेषज्ञों के साथ-साथ पूंजी मौजूद है, वहीं भारत के पास बहुत बड़ा बाजार और प्रचुर मात्ना में कच्चा माल तो है लेकिन यहां बुनियादी ढांचे की कमी है। वस्तुत: द।कोरिया अमेरिका जैसे पुराने दोस्तों पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है ऐसे में भारत के साथ संबंध बढ़ाना उसके लिए अहम है। सॉफ्टवेयर प्रौद्योगिकी, बॉयोटेक, साइबर टेक्नोलॉजी, हेल्थ केयर, ऊर्जा में संयुक्त रूप से शोध के लिए दोनों देशों के विशेषज्ञ मिल कर काम कर रहे हैं।