Girishwar Mishra's blog on ram navami | गिरीश्वर मिश्र का ब्लॉग: मर्यादाओं में ही है जीवन की प्रतिष्ठा
लोकमत फाइल फोटो

Highlights दुर्भाग्यवश आज के जीवन की प्रमुख त्रासदी यही है कि मर्यादा को पिछड़ेपन का चिह्न और विकास विरोधी घोषित कर दिया गया.शांति और सामंजस्य की स्थापना के लिए आचार को सबसे बड़ा धर्म माना गया. महर्षि पतंजलि ने अपने अष्टांग योग के दूसरे चरण को नियम कहा है. ये नि


चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि रामनवमी भगवान राम के जन्मोत्सव का अवसर है. युगों-युगों से गाई जाने वाली उनकी पुण्य गाथा और कुछ नहीं सिर्फ मर्यादाओं के लिए सतत संघर्ष की अद्भुत कहानी है. जीवनर्पयत श्रीराम स्वयं मर्यादाओं के लिए खड़ी होने वाली बाधाओं से जूझते रहे और खुद भी मर्यादाओं की कसौटी पर कसे जाते रहे. इसीलिए उन्हें मर्यादा पुरु षोत्तम कहा जाता है. वे लोक-मंगल के लिए समर्पित एक आदर्श सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के महानायक बन कर उपस्थित हुए और इस काम में समाज के हर वर्ग से सहयोग लिया. राम-राज्य गांधीजी की ही कल्पना में नहीं था, वह आम जनता के हृदय में भी बसी आशा थी जिसमें किसी भी तरह के ताप यानी पीड़ा का अभाव होता है. जीवन की सीमाएं हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती. इसलिए जीवन में स्वस्ति भाव या खुशहाली का रहस्य मर्यादाओं की स्थापना और संरक्षण में ही निहित है. शांति और सामंजस्य की स्थापना के लिए आचार को सबसे बड़ा धर्म माना गया.

महर्षि पतंजलि ने अपने अष्टांग योग के दूसरे चरण को नियम कहा है. ये नियम उन मर्यादाओं को व्यक्त करते हैं जिनको व्यवहार में उतारना आवश्यक है. ये नियम या मर्यादाएं हैं : शौच (स्वच्छता ), संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण. दुर्भाग्यवश आज के जीवन की प्रमुख त्रासदी यही है कि मर्यादा को पिछड़ेपन का चिह्न और विकास विरोधी घोषित कर दिया गया. इसकी जगह हर किस्म की छूट लेने की जीवन शैली अपनानी शुरू की गई. एक तरह की सीमाहीन होती व्यापक उदारता को आदर्श मान बैठने से सारी मर्यादाएं ध्वस्त होने लगीं. भ्रष्ट आचरण, व्यभिचार और अनाचार आदि की बढ़ती घटनाएं मर्यादाओं के हनन को ही प्रदर्शित करती हैं. व्यापक स्तर पर देखें तो वैश्विक स्तर पर होने वाली युद्ध जैसी घटनाएं भी मर्यादाओं के अतिक्र मण को ही द्योतित करती हैं.

आज कोरोना के चलते आम हो या खास हर किसी के जीवन की रफ्तार थम गई है. संक्र मण से बचने के लिए सामाजिक दूरी ही एकमात्न उपाय है. पूरे देश में लॉकडाउन है और अनिवार्य सेवाओं में लगे लोगों के अलावा सभी लोग घर में बंद हैं. दैनिक जीवन के बंधे-बंधाए ढर्रे से अलग हट कर अपने को व्यस्त रखना एक चुनौती बन जाती है. जीवन जीने के लिए सिर के ऊपर लटकते डर के बीच आवश्यक सामान जुटाने की जद्दोजहद भी बनी हुई है. संक्रमण का भय इतना है कि घर से निकलना मन को आशंकाओं से घेर लेता है. बच्चों, बुजुर्गो और बीमार सदस्यों की उपस्थिति घर की संरचना को अलग-अलग ढंग से प्रभावित करती है. घर के अंदर रह कर सभी सदस्य बिना बोर हुए किस तरह अपने समय का उपयोग करें इसका अवसर पैदा करने के लिए धैर्य और सहनशीलता जरूरी है. जिस बड़े पैमाने पर जीवन की व्यवस्था को औचक छेड़ कर उसके छिन्न-भिन्न होने की नौबत आ रही है, उसका एकमात्र उपाय मर्यादा का स्वीकार है. संयम, संतोष और स्वच्छता अपनाते हुए हमें कटिबद्ध होकर तैयार होना होगा.

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