Karnataka: Where votes get on mangalasutra and smartphones, the point of development is redundant | जहां मंगलसूत्र और स्मार्टफोन के नाम पर मिल जाते हों वोट, वहां विकास की बातें बेमानी हैं!

भारतीय जनता पार्टी कर्नाटक के अपने चुनावी अभियान में लगभग सफल हो चुकी है या यूँ कहा जाए कि लगभग सरकार बना चुकी है। इसका पूरा श्रेय जाता है कर्नाटक की भोली भाली जनता को, जिसने कुछ मजेदार चुनावी वादों पर पार्टियों को वोट दिया। उसकी बात हम आगे करेंगे लेकिन उससे पहले कुछ और अहम बिन्दुओं को आपकी पारखी नजरों के सामने लाना चाहता हूँ।  

आज के इस राजनीतिक पारिद्रश्य में कहा जाता है कि सोशल मीडिया पर आप प्रचार से अपने पक्ष में कोई भी इमेज बना सकते हैं। कई लोग यह भी कहते हैं कि अगर जनता पार्टियों से और उनकी नाकामी से नाराज हो गई तो फिर आपका कुछ नहीं होने वाला। दावे किए जाते हैं देश की राजधानी दिल्ली में बड़े-बड़े फ्लाईओवर बनाने वाली शीला दीक्षित की कांग्रेस सरकार सिर्फ इसलिए सत्ता से बाहर हो गई थी क्योंकि लोगों में कांग्रेस सरकार के खिलाफ गुस्सा था और कोई भी सरकार जुमलों के सहारे जनता को ज्यादा दिनों तक बेवकूफ नहीं बना सकती। लेकिन क्या ये सच है? क्या सच में ऐसा होता है कि जनता गुस्से में आकर किसी भी पार्टी को सत्ता के अंदर और सत्ता से बाहर कर सकती है?

ये सवाल इस वजह से भी अहम हो जाता है है क्योंकि यहाँ की जनता को बेवकूफ बनाना बहुत आसान है। लोग यहाँ मुफ़्त की चीज़ों के लिए किसी को भी वोट दे देते हैं तो हम बदलाव को किस तरह आंक सकते हैं? एक सवाल और पूछ रहा हूँ कि कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी को मिलीं 104 सीटें उनके द्वारा किए गए विकास का नतीजा हैं या इसके पीछे की वजह चुनावी वादों में किए गए मंगलसूत्र और स्मार्टफोन देने का वादा है।

भाजपा ने कर्नाटक चुनाव के लिए जब अपना घोषणापत्र जारी किया था तब उन्होंने इस घोषणापत्र में कई लोक लुभावने वादे किये थे। भाजपा के घोषणापत्र में महिलाओं को मंगलसूत्र और स्मार्टफोन देने तक के वादे किए। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को इस बात का पूरा अंदाजा है कि वोट विकास के नाम पर नहीं ऐसे छोटे मोटे वादे करने से भी पाए जा सकते हैं। यहां से भोलेभाले लोग राज्य और देश की बागडोर एक मंगलसूत्र और स्मार्टफोन के नाम पर किसी के भी हाथ में दे देंगे! लोग ये भूल जाते हैं कि वो एक सरकार चुनने जा रहे हैं, न कि किसी दुकान या शॉपिंग मॉल से खरीदारी कर रहे हैं। 

ये होड़ है वास्तविकता से दूर झूठे वादे करने की। प्रत्येक राजनीतिक दल की घोषणापत्र में वादों की लंबी चौड़ी फेहरिस्त होती है जबकि अतीत में किए उनके काम बताते हैं कि सत्ता में आने के बाद वे अपने घोषणा पत्र के कुछ ही हिस्सों को लागू कर पाते हैं।

पार्टियों में ये होड़ है वास्तविकता से दूर इस तरह के वादे करने की। हम हर रोज अख़बारों, टेलीविजन और इंटरनेट के माध्यम से देखते हैं कि बड़ी-बड़ी ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स लकी ड्रा के साथ अपने सामान बेचती हैं। लेकिन शायद अब आने वाले दिनों में राजनीतिक पार्टियों के लकी ड्रॉ के भी विज्ञापन आपको नजर आएं। राजनीतिक दल वादे इसलिए करते हैं कि लोग उन्हें सत्ता की चाभी सौंपें लेकिन लोग इस तरह के वादों पर भी वोट करेंगे, सोचना भी बेमानी सा लगता है।

वादा तो अच्छे दिनों का भी था 'अच्छे दिन आने वाले हैं और हमने सिर्फ आप पर विश्वास करके आपको पूर्ण बहुमत दिया जब आपको पूर्ण बहुमत मिला लेकिन अभी तक वो अच्छे दिन नजर नहीं आए। 

नेताओं और पार्टियों के वादों को देखकर बस इतना ही कहा जा सकता है कि अब वो दिन ज्यादा दूर नहीं जब पार्टियाँ वोट पाने के लिए मुफ्त में एक कटोरी और एक बनियान देने का वादा भी करें। ये सब इसलिए कहा जा सकता है कि जब जनता महज मंगलसूत्र और स्मार्टफ़ोन पाने के नाम पर तालियाँ बजाते हुए वोट दे सकती है आने वाले कुछ ही सालों में समय बनियान और कटोरी वाला ही आएगा।