When the court had to work for the government | ब्लॉग: जब अदालत को सरकार का काम करना पड़े!
ब्लॉग: जब अदालत को सरकार का काम करना पड़े!

सितंबर महीने के आखिरी दिन हमारे लोकतांत्रिक भारतीय राज्य के लिए एक खास तरह से शोचनीय साबित हुए हैं। 22 से 28 सितंबर के बीच सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न विषयों पर बीस मुकदमों का फैसला सुना कर एक ऐसा संदेश दिया है जिसका वास्तविक अर्थ ग्रहण करने से हम सब कतरा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जिन विषयों पर अपने निर्णय दिए हैं उन पर नजर डालने से यह संदेश कुछ-कुछ साफ हो सकता है। इनमें से कुछ विषय इस प्रकार हैं- राजनीति का अपराधीकरण, वैवाहिक संबंधों में स्त्रियों की यौन वफादारी, रामजन्मभूमि आंदोलन के धाíमक पहलू, आधार कार्ड की वैधता का दायरा, सबरीमाला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश की इजाजत और पदोन्नतियों में आरक्षण का सवाल। 

अदालत ने जिन विषयों को छुआ उनसे जाहिर है कि राजनीति, व्यक्तिगत जीवन, प्रशासन, नागरिकता और धाíमक जीवन के हर क्षेत्र में उसने फैसले दिए। इन फैसलों का अच्छा या बुरा, अथवा फौरी और दूरगामी असर क्या पड़ेगा, यह अलग विश्लेषण का विषय है। जाहिर है कि इनमें से कुछ फैसले अदालत ही ले सकती थी (जैसे यौन शुचिता के उल्लंघन वाला कानून), लेकिन क्या बाकी सभी विषय सर्वोच्च अदालत के पास जाने चाहिए थे? अदालत से अगर कानून की समीक्षा का काम लिया जाता है, तो वह उसका काम है और उसे वह करना चाहिए। लेकिन, क्या भारतीय लोकतांत्रिक राज्य के कार्यकारी हिस्से (विधायिका और कार्यपालिका) ने अदालत को इस तरह का व्यापक और बहुआयामी हस्तक्षेप करने दे कर अपने ही कार्यक्षेत्र- अधिकारक्षेत्र का अतिक्रमण किए जाने की स्थितियां पैदा नहीं कर दी हैं? 

क्या भारत की संवैधानिक रूप से चुनी हुई अधिकारसंपन्न सरकार रैडिकल चुनाव सुधारों की प्रक्रिया चला कर अपने स्तर पर राजनीति के अपराधीकरण पर प्रभावी रोक नहीं लगा सकती थी? क्या पदोन्नतियों में आरक्षण देने या न देने का प्रश्न सीधे-सीधे सरकारी निर्णय का विषय नहीं है? क्या  सामाजिक न्याय और मेरिट (योग्यता) के आग्रहों के बीच संतुलन कैसे कायम करने की जिम्मेदारी सरकार की नहीं होनी चाहिए थी? तीन तलाक के मसले पर सरकार अपनी कार्यकारी और विधायी शक्ति का इस्तेमाल करने के मामले में न केवल असाधारण पहलकदमी दिखाती है, बल्कि उसका प्रचार भी करती है।

लेकिन ऐसा क्यों है कि वह लैंगिक न्याय के दूसरे मसले पर वैसी ही पहलकदमी करने से संकोच करती नजर आती है? आखिर सरकार और उसके सलाहकारों का मंडल स्वयं ही यह सोच पाने में समर्थ क्यों नहीं हुआ कि आधार कार्ड को जिंदा रहने की शर्त बना कर वह एक निगरानीमूलक राज्य (मॉनीटरिंग स्टेट) की आधारभूमि तैयार कर रही है? सरकार इस मसले पर आत्मसंयम क्यों नहीं दिखा पाई? देश का शायद ही कोई प्रेक्षक इस बात से सहमत नहीं होगा कि रामजन्मभूमि मंदिर का मसला अंतिम रूप से अदालत नहीं तय कर सकती। यह मसला एक ऐसी सरकार ही तय कर सकती है जिसकी सभी संबंधिक पक्षों के  बीच निष्पक्ष और न्यायसंगत छवि हो। प्रश्न यह है कि हमारी सरकारों की छवि इस तरह की क्यों 
नहीं होती? 
मेरा मानना है कि यह एक पुरानी समस्या है जो धीरे-धीरे जमा होते हुए इस स्तर पर आ गई कि एक हफ्ते के भीतर-भीतर सुप्रीम कोर्ट केवल कानून की समीक्षा करने का अपना दायित्व निभाने के साथ-साथ इस देश की सरकार चलाते हुए ही दिखने लगा है। भ्रष्टाचार के बहुत मसलों पर अदालत अक्सर स्पेशल इनवेस्टिगेटिंग टीम गठित करने का आदेश देती है, और खुद उसके कामकाज पर निगरानी करती है। सवाल यह है कि सरकार या सरकारें ऐसी नौबत आने ही क्यों देती हैं? केंद्र या राज्य सरकार म्युनिसिपैलिटी नहीं है, जिसका काम केवल सड़क और नालियों की सफाई और चुंगी कर वसूलना होता है। सरकारों को तो चुनावी लाभ-हानि के क्षुद्र आग्रहों से परे जा कर साहस के साथ नीति-निर्माण और उस पर सख्ती और लचीलेपन के मिलेजुले रवैये को अपनाते हुए दिखना चाहिए।
 
सरकारें चलाने वाली पार्टयिां किसी भी विवाद से बचते हुए अपने-अपने वोटिंग आधारों को नाखुश न होने देने के जुगाड़ में लगी रहती हैं। यह प्रवृत्ति इतनी संगीन हो गई है कि उनके द्वारा गठित की जाने वाली सरकारों ने खुद ही अपने आपको अपने कर्तव्यों से च्युत कर लिया है। जो काम सरकारों को करने चाहिए वे अदालतों को करने पड़ रहे हैं। इसीलिए कार्यपालिका में न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बहुत बढ़ गई है और लोकतंत्र में अधिकार-क्षेत्रों का संतुलन बिगड़ गया है।


Web Title: When the court had to work for the government
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