Vijay Darda Blog: The biggest problem is the lack of national character | सबसे बड़ी समस्या है राष्ट्रीय चरित्र का अभाव
सबसे बड़ी समस्या है राष्ट्रीय चरित्र का अभाव

विजय दर्डा

पिछले दिनों कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनसे मैं बुरी तरह विचलित हूं। बिहार के मुजफ्फरपुर में एक शेल्टर होम में 7 से 18 साल की बच्चियों के साथ लगातार रेप होता रहा और उन बच्चियों की चीख हमारे कानों तक नहीं पहुंची। मैं ‘हमारे’ शब्द का उपयोग पूरे समाज और पूरी व्यवस्था के लिए कर रहा हूं जिसमें शासन और प्रशासन भी शामिल हैं। अभी तक की खबर यह है कि 42 में से 34 बच्चियों के साथ दरिंदों ने रेप किया। दरिंदों की इस सूची में केवल ब्रजेश ठाकुर ही शामिल नहीं है बल्कि सत्ता व्यवस्था में बैठे हुए बहुत से लोग भी शामिल रहे होंगे जिनकी बदौलत ब्रजेश ठाकुर अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह बन बैठा था। बात यह भी उभर कर सामने आ रही है कि तीन साल के दौरान शेल्टर होम से 11 बच्चियां गायब भी हुई हैं। अभी पता नहीं कि दरिंदों ने उनके साथ क्या किया। वो जिंदा भी हैं या नहीं? आश्चर्यजनक यह है कि इस पूरे मामले पर सुशासन बाबू यानी नीतीश कुमार ने कई महीने बाद चुप्पी तोड़ी है। मामला अब सीबीआई के पास है।
 
पिछले दिनों दिल्ली में तीन बच्चियों और झारखंड की एक महिला की भूख से मौत की खबर से भी मैं आहत हूं। सोच रहा हूं कि जो देश मंगल पर अपना यान भेजने में सफल हुआ और जो आने वाले वर्षो में चांद पर उतरने की तैयारी कर रहा है, जिस देश में अनाज का भंडार भरा है और जो दुनिया की भूख मिटा रहा है, वह देश धरती के अपने हिस्से में रह रहे लोगों की भूख भी क्यों नहीं मिटा पा रहा है? करीब पंद्रह साल पहले हमारे महान वैज्ञानिक अब्दुल कलाम से गुजरात के आनंद शहर में बच्चों ने एक सवाल पूछा था कि हमारा सबसे बड़ा दुश्मन कौन है? कलाम साहब ने बच्चों से ही इस सवाल का जवाब पूछ लिया था। तब एक बच्ची पारुल ने कहा था कि हमारा सबसे बड़ा दुश्मन ‘गरीबी’ है। कलाम साहब ने कहा था कि यही सच है। हमें तरक्की करनी है तो गरीबी के खिलाफ जंग लड़नी होगी। दुर्भाग्य देखिए कि तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद भूख से मौत की खबरें रह रह कर सामने आती रहती हैं। दुख यह होता है कि इसके लिए जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती कि किसी गरीब तक अन्न का दाना न पहुंच पाने के लिए कौन जिम्मेदार है? कुछ महीने पहले झारखंड में भूख से एक बच्ची की मौत हो गई थी। पता चला था कि राशन कार्ड होने के बावजूद उसे अनाज इसलिए नहीं मिला कि आधार वेरिफाई नहीं हो पाया। खूब हल्ला मचा लेकिन किसी अधिकारी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब दिल्ली में तीन बहनों की भूख से मौत का मामला उछला। दिल्ली सरकार ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण भी माना लेकिन कोई जिम्मेदारी तय नहीं हुई!
 
पिछले सप्ताह ही खबर आई कि दिल्ली-आगरा एक्सप्रेस हाईवे का साइड लेन अचानक धंस गया और एक कार पचास फुट नीचे गड्ढे में गिर गई! साफ है कि सड़क के इस हिस्से का निर्माणकार्य घटिया हुआ होगा अन्यथा कोई सड़क ऐसे कैसे धंस जाएगी? चीन में इस तरह की एक घटना हुई थी, वहां दोषी को फांसी दे दी गई। हमारे यहां कभी ऐसा नहीं होता। मैं दुनिया भर में घूमता रहता हूं और इस बात को लगातार महसूस भी करता रहा हूं कि हमारे देश में सड़कों का निर्माण स्तरीय नहीं होता। बिल्कुल समतल और चिकनी सड़क तो कहीं दिखाई ही नहीं देती। सीमेंट की नई नवेली सड़कों पर भी कार हिचकोले खाती है। वहीं दुनिया के दूसरे देशों में यदि आप कार की सवारी कर रहे हैं तो पेट का पानी भी नहीं हिलता। जाहिर सी बात है कि हमारे यहां सड़क निर्माण में उच्च गुणवत्ता का ख्याल नहीं रखा जाता। ठेकेदारों और इंजीनियरों की मिलभगत के कारण सड़कों का न निर्माण ठीक होता है और न ही रखरखाव ठीक होता है। अब मुंबई का ही हाल देखिए। गड्ढों के कारण स्थिति इतनी खराब है कि गणोश विसर्जन का जुलूस निकालने वाले संगठन चिंतित हो गए हैं। अधिकारियों ने यह आश्वासन तो दिया है कि जहां से जुलूस निकाले जाएंगे, उस इलाके के गड्ढे भर दिए जाएंगे लेकिन सवाल यह है कि हर साल गड्ढे होते क्यों हैं? क्या किसी इंजीनियर या किसी ठेकेदार को कभी जिम्मेदार ठहराया गया या किसी के खिलाफ कार्रवाई की गई?

अभी असम का मामला आया। चालीस लाख लोगों का नाम राष्ट्रीय नागरिकता सूची में नहीं है। दूसरे राज्यों में तो अभी सूची तैयार ही नहीं हुई है। एक आकलन है कि करीब तीन करोड़ विदेशी नागरिक हमारे देश में रह रहे हैं। यह सवाल उठना वाजिब है कि ये स्थिति पैदा कैसे हुई। इतनी बड़ी संख्या में लोग आते चले गए और हमारी व्यवस्था चुप्पी साधे रही? और अब सूची बना लेने से भी क्या होगा। कहां भेजेंगे इनको? कौन देश इन्हें वापस लेगा?

ऐसे बहुत सारे मुद्दे हैं बल्कि मैं कहूंगा कि अनगिनत मुद्दे हैं जो हमें बेचैन करते हैं। हमें गहराई से सोचना होगा कि ऐसा क्यों हो रहा है? दरअसल इन सबका कारण है हमारे भीतर राष्ट्रीय सोच का अभाव। जब सोच राष्ट्रीय नहीं होगी तो राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण नहीं होगा। राष्ट्रीय चरित्र यानी नेशनल कैरेक्टर का मतलब यह है कि हमारा हर कदम, हमारा हर प्रयास, हमारी हर कोशिश, हमारी हर सोच राष्ट्रवाद से प्रेरित हो। दुर्भाग्य से राष्ट्रवाद शब्द इस समय धार्मिक रंग में रंग गया है। राजनीति ने इसकी नई परिभाषा गढ़ दी है। इसे सांप्रदायिक रंग दे दिया गया है। यदि एक खास सोच से आप वास्ता रखते हैं तो राष्ट्रवादी हैं अन्यथा आपको देश के खिलाफ करार दे दिया जाएगा। सांप्रदायिक सोच, विचार और प्रचारतंत्र ने माहौल को गंदा करने का काम किया है। समाज हमारा बंटता हुआ दिखाई दे रहा है। जाति, भाषा और संप्रदाय के नाम पर हमें बांटा जा रहा है। यदि हम इससे बाहर नहीं निकले और राष्ट्रवाद की सही परिभाषा लोगों तक नहीं पहुंचाई तो देश के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी। दुनिया के विकसित देशों के नागरिकों में राष्ट्रीय चरित्र होता है। अपने देश के लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। हमारे यहां क्यों नहीं है राष्ट्रीय चरित्र। देखिए, राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रीय चरित्र में अंतर होता है। सड़क पर ट्रैफिक का रूल तोड़ने वाला राष्ट्रभक्त हो सकता है लेकिन कानून तोड़कर उसने बता दिया कि उसके पास राष्ट्रीय चरित्र नहीं है। राष्ट्रभक्ति तो हम सबमें है लेकिन राष्ट्रीय चरित्र कितने लोगों में है? बिना राष्ट्रीय चरित्र के हम सशक्त और सुसंस्कृत देश का निर्माण नहीं कर सकते! और हां, राष्ट्रीय चरित्र कहीं दुकान में नहीं मिलता। इसे बच्चों में जन्म के समय से ही भरना पड़ता है। राष्ट्रीय चरित्र निर्माण में हमारी व्यवस्था और साधु-संत तो असफल हो चुके हैं। यह दायित्व अब माता-पिता और शिक्षकों को ही निभाना होगा। एक बात मैं और कहना चाहूंगा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक जितने भी प्रधानमंत्री बने हैं उन्होंने देश को आगे ले जाने की भरसक कोशिश की है। मोदीजी 18 घंटे काम करते हैं लेकिन जब शासन, प्रशासन और व्यवस्था साथ नहीं देंगे तो सफलता कैसे मिलेगी?  

और अंत में...

पुर्तगाल में हुए इंटरनेशनल फिजिक्स ओलंपियाड में भारतीय छात्रों ने देश का नाम रौशन कर दिया। पांचों छात्नों ने गोल्ड मेडल जीता है। 21 वर्षो में यह  पहली बार है जब किसी देश की टीम के सभी पांच छात्नों ने गोल्ड मेडल जीता हो। मैं भास्कर गुप्ता (मुंबई), लय जैन (कोटा), निशांत अभांगी (राजकोट), पवन गोयल (जयपुर) और सिद्धार्थ तिवारी (कोलकाता) को तहेदिल से बधाई देता हूं। ये हैं हमारे असली हीरो।

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