Truth of Indian Media blog written by Suvasit | 2 अगस्त 2017 Vs 2 अगस्त 2018 : 'पत्रकारिता' की एक सच्चाई ये भी है जनाब !
2 अगस्त 2017 Vs 2 अगस्त 2018 : 'पत्रकारिता' की एक सच्चाई ये भी है जनाब !

2 अगस्त 2017 को ठीक 10 बजे मैं अपने पुराने दफ्तर में था। सबकुछ वैसा ही चल रहा था जैसा हर रोज़ चलता था। मैं अपनी स्टोरीज करने में व्यस्त था। उसी शिद्दत और लगन के साथ ताकि कोई भी खबर छूट ना जाए। तब दिन के 11:30 बजे होंगे, मेरे तत्कालीन बॉस ने मुझे और मेरे टीम के 4 साथियों को कांफ्रेस रूम में बुलाया। उस कांफ्रेंस रूम में बॉस के भी बॉस लोग और HR की एक मैडम पहले से बैठी हुई थीं। रूम का माहौल काफी गंभीर और शांत था। घुसते ही लगा 'कुछ तो गड़बड़ है दया'।

हम सब को बैठाया गया और एकदम गंभीर स्वर में 'भूमिका बनाने' की शुरुआत की गई। 'भूमिका' बनाते बनाते बात यहां तक पहुंची की हमें नौकरी से निकाला जा रहा है। एक बार को लगा की पैर के नीचे से जमीन खिसक गई हो। स्टार/एबीपी न्यूज, आजतक और एनडीटीवी से होता हुआ मेरा करियर इस संस्थान तक पहुंचा था। मेरे करियर में ये पहली बार हुआ था। कुछ देर के लिए तो समझ ही नहीं आया कि रिएक्ट कैसे करूं। खुद को संभाला और कान और दिमाग को ये यकीन दिलाने की कोशिश करने लगा कि अब यही 'सत्य' है कि मैं तत्काल प्रभाव से 'बेरोजगार' हो गया हूं। कुछ ऐसा ही हाल मेरे दूसरे साथियों का भी था। सब एक दूसरे की शक्ल देखने लगे। 

हमें तत्काल ऑफिस छोड़ने को बोला गया। लंच में खाने के लिए जो खाना लाया था वो भी अब तक ठंडा नहीं हुआ था। रूम में बैठे 'महामहिमों' ने ये फैसला सुनाने के बाद ऐसी शक्ल बनाई जैसे अभी हमारे साथ वो भी रो पड़ेंगे। कोरा वादा किया कि नई नौकरी दिलाने में मदद करेंगे। लेकिन, उनकी सच्चाई मुझे पता थी। आज तक उस पैनल में बैठे लोगों का कॉल तो दूर एक मैसेज भी नहीं आया है।

हम सब बड़े बेज़ार होकर उस ऑफिस से निकलने की तैयारी करने लगे। बाहर निकलते ही पूरा ऑफिस हमें घूर रहा था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि उन्हें रिएक्ट कैसे करूं। बस मुस्कुरा कर अपने अंदर के भूचाल को शांत करने की कोशिश कर रहा था। अपने डेस्क पर पहुंचा। सामान समेटना शुरू कर दिया। कुछ दिनों पहले ही मेरा बर्थ डे था तो HR की तरफ से एक ग्रीटिंग कार्ड मेरे डेस्क पर लगाया गया था। मैंने उसे भी एक अच्छी याद समझ अपने बैग में डाल लिया। मैंने IT डिपार्टमेंट से रिक्वेस्ट किया कि कम से कम आज भर मेरा लैपटॉप मेरे साथ रहने दिया जाए ताकि मैं अपने पर्सनल डाटा उसमें से निकाल सकूं। वो मान गए। मैं अपनी पूरी टीम के साथ ऑफिस से निकल गया। बस दिमाग में ये बात घूमती रही कि आखिर ऐसा हुआ क्यों और आगे क्या होगा?

जिसे भी ये बात चली सबने अपने अपने क्षोभ प्रकट किए। कई फोन आए, कई मैसेज आए। ज्यादातर लोगों ने ये कहा कि घबराओ मत सब ठीक हो जाएगा। उस दिन के बाद मेरे नेटवर्क में जितने भी लोग थे सबको कॉन्टैक्ट किया और अपनी व्यथा बताई। मैं हैरान था कि मेरे नेटवर्क के ज्यादातर लोग जो किसी ना किसी अच्छे संस्थान में थे सबने दु:ख तो जताया लेकिन मेरी मदद करने में 'मजबूरी' का हवाला देने लगे। सब अपने अपने संस्थान का रोना-रो कर ये बताने की कोशिश करने लगे कि हमारे यहां तो बहुत मुश्किल है नौकरी मिलना। हर किसी की अपनी अपनी कहानी थी। लेकिन, मुझे मदद कहीं से नहीं मिली।

कुछ वैसे लोग भी थे जिन्होंने हर संभव मेरी मदद की। कॉन्टैक्ट्स शेयर किए। मुझे अलग अलग जगह जाकर मिलने को कहा। लेकिन, ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम थी जो सीधे तौर पर मेरी मदद करने के लिए सामने आए थे। नौकरी छूटने के कुछ दिन बाद तक तो जैसे तैसे मामला संभल गया लेकिन, दिन-ब-दिन मामला गंभीर होता जा रहा था। हाथ में नौकरी नहीं थी और सामने कुछ अच्छा नज़र नहीं आ रहा था।

लेकिन, अचानक नौकरी जाने की स्थिति में ना तो मेरा संस्थान मेरे साथ खड़ा था और ना ही कोई 'एडिटर गिल्ड'। ना तो कोई बड़ा नाम मेरे लिए आर्टिकल लिखता था और ना ही ट्विटर पर #ISupportSuvasit ट्रेंड कर रहा था। मुझे अचानक नौकरी से निकाल दिए जाने के विरोध में कोई 'जनता का रिपोर्टर' बड़े बड़े आर्टिकल भी नहीं लिख रहा था। क्योंकि, मैं ना तो पुण्य प्रसून था और ना ही अभिसार शर्मा। किसी को मेरे जैसे पत्रकार की नौकरी छूट जाने भर से क्या फर्क पड़ता ? शायद एक पैसे का भी नहीं।

लेकिन, मैं ऐसा अकेला नहीं हूं। मुझे नवबंर 2017 में नई नौकरी (पहले से ज्यादा अच्छी) मिल तो गई लेकिन, मेरे जैसे हालात हमारे इंडस्ट्री में रोज़ आते हैं। मैं तो थोड़ा सबल था तो संभल गया। लेकिन, बड़े बड़े मीडिया संस्थानों से आए दिन कई लोग ऐसे ही निकाल दिए जाते हैं। उनकी सैलरी भी 20-25 हज़ार से ज्यादा नहीं होती। नौकरी छूटने की वजह से उनके घर में भुखमरी जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। बच्चों का स्कूल जाना छूट जाता है। वही तथाकथित देश के 'निष्पक्ष और संवेदनशील' पत्रकार नौकरी देने तक को राज़ी नहीं होते। अरे कॉल तक रिसीव करना बंद कर देते हैं साहब और गलती से कॉल उठा भी लिया तो झूठी तसल्ली देकर फोन काट देते हैं। 

2 अगस्त, 2018 को जब देश के बड़े चैनल देश के दो 'मास्टस्ट्रोक' पत्रकार को बाहर का रास्ता दिखाया गया को ट्विटर, फेसबुक सहित अखबार के पन्ने, टीवी की स्क्रीन और यहां तक कि देश के संसद तक में इसके खिलाफ आवाज़ बुलंद हो गई। चारों और से विलाप शुरू हो गया। पिछले तीन दिन से ट्विटर पर इसके खिलाफ हैशटैग की बाढ़ आई हुई है। देश में आपातकाल की स्थिति आ गई है, ऐसा बताया जा रहा है। 'एडिटर गिल्ड' भी इन दोनों पत्रकारों के साथ ढाल बनकर खड़ा है।

अगर सरकार के दबाव में ऐसा हुआ है तो ये सरासर गलत है। इसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए वो कम है। लेकिन, इसका दूसरा पहलू ये भी है कि जब बड़े बड़े मीडिया संस्थान एक साथ कई लोगों को नौकरी से निकाल देते हैं तब ये तथाकथित बड़े पत्रकारों और 'एडिटर गिल्ड' का ज़मीर कहां मर जाता है। क्यों कोई उन लाचार पत्रकारों के साथ खड़ा नहीं होता? क्यों इस मुद्दे पर कोई 'प्राइम टाइम' डिबेट नहीं होती ? क्यों कोई स्क्रीन 'काली' नहीं होती ? और क्यों ट्विटर पर उनके समर्थन में कोई 'हैशटैग' ट्रेंड नहीं होता ? नहीं होगा। ऐसा कभी नहीं होगा। एक 17 लाख रुपये महीने का तनख्वाह पाने वाले पत्रकार के सामने ऐसे पत्रकार इतने 'छोटे' हैं कि उनका दर्द किसी को दिखाई नहीं देगा। 

ये कहानी यूं ही चलती रहेगी। मेरे जैसे कई ऐसे पोस्ट लिखते रहेंगे और एक-आध लाइक्स बटोर इतिहास के पन्नों में खोते रहेंगे। क्योंकि पत्रकारिता में  जिसका 'गुर्गा' जितना बड़ा और रसूख वाला होगा उसकी पत्रकारिता चमकती रहेगी (इस लाइन को मेरा अत्यंत निजी अनुभव समझा जाए)। ये पूरा वाकया मेरे मन में आया क्योंकि 2 अगस्त 2017 और 2 अगस्त 2018 में बहुत कुछ कॉमन था। बस साल बदल गया था।

English summary :
Truth and real face of Indian Media. A story of a journalist revealing the truth of the Indian Media.


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