Sarang Thatte's blog: Army's spirit, fires in the desert, india pakistan ceasefire | सारंग थत्ते का ब्लॉग: सेना का जज्बा, रेगिस्तान में धधकता जलवा
सारंग थत्ते का ब्लॉग: सेना का जज्बा, रेगिस्तान में धधकता जलवा

Highlightsभारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर का उल्लंघन एक आम बात हो गई है.पाकिस्तान ने पिछले तीन माह में 1050 बार युद्धविराम का उल्लंघन किया है

भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर का उल्लंघन एक आम बात हो गई है. अगस्त के पहले सप्ताह में जम्मू-कश्मीर में नए नक्शे को अमली जामा पहनाने के बाद पाकिस्तान ने अपनी भड़ास निकालने की ठान ली और तब से बड़े मोर्टार तथा आर्टिलरी से हमारी अनेक पोस्टों और नागरिक ठिकानों पर बमबारी निरंतर खबरों में सुर्खियां बटोर रही है. पाकिस्तान ने पिछले तीन माह में 1050 बार युद्धविराम का उल्लंघन किया है, जबकि साल का टोटल 2670 रहा है. हमारी सेना ने हर समय माकूल जवाब दिया है.

इस माहौल के बीच भारतीय सेना ने राजस्थान  में थार के रेगिस्तान में एक बड़े सैन्य अभ्यास का श्री गणेश किया है. हमारी आक्रामक स्ट्राइक फॉरमेशन की एक इकाई 21वीं कोर ने अपने पूरे लाव लश्कर के साथ सालाना प्रशिक्षण के दौर में सांकेतिक दुश्मन के इलाके में तेजी से और एकीकृत होकर अग्रसर होने की कवायद शुरू कर दी है. सिंधु सुदर्शन  एक्सरसाइज में लगभग 40,000 अधिकारी और  सैनिकों ने, टैंक, बख्तरबंद वाहन, आर्टिलरी की के-9 तोपें, अटैक हेलिकॉप्टर, स्पेशल फोर्सेस, हवाई जहाज और अन्य संसाधनों को साथ लेकर दुश्मन को परास्त करने का बीड़ा उठाया है.

असली युद्ध के पैमाने और मापदंड अपनी जमीन पर लाना एक बेहद मुश्किल कार्य है. इसमें लाल देश और नील देश की संज्ञा के साथ हमारी मित्र सेना और सांकेतिक दुश्मन की सेना की कार्यवाही का आकलन करने वाले अंपायर की भूमिका में एक अलग फॉरमेशन भी शामिल होती है.


थलसेना के पास फिलहाल तीन स्ट्राइक कोर हैं ंजिसका मुख्य काम तेजी और फुर्ती के साथ गरजते हुए तूफानी तोपों की गोलाबारी के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करना है. टी-90 टैंकों के साथ दुश्मन पर इतना घातक वार करें कि उसे मौका ही ना मिले इससे उलझने का! यह कहना जितना आसान है उतना ही जमीन पर कर पाना एक टेढ़ी खीर है.

स्ट्राइक कोर की विभिन्न यूनिट अपनी-अपनी छावनियों में रहते हुए छोटे स्तर पर अपने लड़ाई के हुनर को चुस्त दुरु स्त करती रहती हैं - सभी हथियारों का उपयोग, वाहनों का रखरखाव, अन्य अंगों के साथ मेल-मिलाप और दिशा-निर्देशों के अनुसार युद्ध की रणनीति के अनुरूप अपनी सोच एवं तैयारी को ढालती रहती हैं. लेकिन असली इम्तिहान राजस्थान के रेतीले टीलों पर होता है, जहां उड़ती गरम तपती रेत और तापमान अपना असर वाहनों, टैंकों और सैनिकों की सेहत पर दिखाता है. कोई रात में रास्ता भटक कर एक्सरसाइज के दुश्मन के इलाके  में युद्धबंदी हो जाता है या संचार के अभाव में जरूरी गोलाबारी कमजोर होती नजर आती है. इसीलिए सेना के विशेषज्ञ यह मानते हैं कि रेगिस्तान की लड़ाई बहुत हद तक मैन - मशीन की मनोवैज्ञानिक लड़ाई है.

सीमा के पार मौजूद जमीनी हालात के अनुकूल वातावरण एवं भूभाग को ध्यान में रखकर नदियां, नाले, डिच कम बंद, दुश्मन के जमाव बिंदु, सैन्य ठिकाने, रडार स्टेशन, हवाई अड्डे, अग्रिम हवाई पट्टी, रेलवे लाइन, रेगिस्तानी इलाके के ढोरे का सजीव चित्रण एक्सरसाइज इलाके में बनाया जाता है. भारतीय सेना की भोपाल की 21वीं कोर और उसके तमाम यूनिट इस समय अपनी-अपनी छावनियों से बाहर रहकर इस प्रशिक्षण में शामिल हंै. ब्रिज बनाने वाली यूनिट इंदिरा गांधी कनाल पर अपनी सिखलाई को रात के अंधेरे में करने को बाध्य है.

संचार के साधनों को भी युद्ध की गति के अनुरूप आगे बढ़कर पीछे मौजूद मुख्यालयों को जोड़ने का काम तीव्रता और चौकस रहकर करना लाजमी है. बिना संचार के कोई भी सैन्य कमांडर युद्धभूमि में जीत हासिल नहीं कर सकता. इसी एकीकृत चाल और लिए गए कदमों का असर अंपायर लगातार देखते रहते हैं.

इस प्रशिक्षण का पहला हिस्सा था पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज पर विभिन्न मोर्टार, तोपों और आर्टिलरी की गोलाबारी का प्रदर्शन, जो पिछले माह हो चुका था. अब टी-72 टैंकों के साथ मैकेनाइज्ड इंफेंट्री जो बख्तरबंद वाहनों में हंै आगे बढ़ती हुई टैंकों द्वारा पार की गई दुश्मन की जमीन को अपने कब्जे में करने की कवायद करती है. इस बार भारत में निर्मित के-9 वज्र सेल्फ प्रोपेल्ड आर्टिलरी की तोपों की हरकत और पराक्र म का आकलन सेना कर रही है. इसकी मारक क्षमता, रेगिस्तान में हरकत की चाल और कार्य करने के लिए समयचक्र  की पहचान और इस्तेमाल का आकलन भी किया जा रहा है. हम

देश में बनाई जा रही 100 नई के-9 वज्र तोप भारतीय सेना में शामिल कर रहे हैं.जब पुल का निर्माण रात के समय होगा तब ही सेना की आर्मर्ड यूनिट अपने टैंक और अन्य बख्तरबंद वाहन अवरोध के पार ले जाएंगे. यह सब एक रात में होना नितांत आवश्यक है क्योंकि सुबह की रोशनी के साथ दुश्मन के लड़ाकू बमवर्षक विमान हमारी खैर-खबर लेने निकल पड़ेंगे.  

  नवीनतम हथियारों और प्रोद्योगिकी से लैस हमारी यूनिटों की काबिलियत की जांच इस अभ्यास में होगी वहीं रडार, अवाक्स और अन्य साधनों का सही इस्तेमाल दुश्मन को खोजने में कितनी तत्परता से किया जाता है इसका भी जायका लिया जाएगा. सभी तरीकों के वातावरण में सेना को अपना कार्य सुगमता से करना जरूरी है. इसमे न्यूक्लियर, बायोलॉजिकल एवं केमिकल वातावरण में विशेष परिधान से अपना काम सुनियोजित तरीके से करना भी सभी सैनिकों के लिए जरूरी हो जाता है.

 

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