rss preferences and narendra modi, bjp | अभय कुमार दुबे का ब्लाॉगः संघ परिवार की प्राथमिकताएं और मोदी
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हाल ही में एक सांस्कृतिक तर्क के तहत दावा किया गया है कि भारतीय जनता पार्टी ने देश भर में मतदाताओं को जो कहानी सुनाई, उसके मर्म में संस्कृति थी, न कि राजनीति. लेकिन जब पूछा गया कि आखिर वे कौन सी बातें हैं जो भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को दूसरी पार्टयिों के मुकाबले अधिक स्पष्ट रूप से सांस्कृतिक बना देती हैं, तो जानकारी मिली कि राम मंदिर बनवाना, कश्मीर से धारा 370 हटवाना और समान नागरिक संहिता बनाना आदि बातें उस सांस्कृतिक मर्म की नुमाइंदगी करती हैं. यह तो खोदा पहाड़ निकली चुहिया जैसी बात हो गई. इस तरह की तथाकथित रूप से सांस्कृतिक बातें तो भाजपा अस्सी के दशक में अपने जन्म से ही कर रही है. दरअसल, भाजपा का इतिहास इन प्रश्नों के इर्द-गिर्द राजनीति करने का न हो कर इन कथित सांस्कृतिक मांगों को गठजोड़ राजनीति करने के लिए तरह-तरह के तर्क देकर ठंडे बस्ते में डालने वाला रहा है. 

व्यावहारिक स्थिति यह है कि लगातार दो बार बहुमत प्राप्त करने के कारण पार्टी में इस बात की हिम्मत आ गई है कि वह अपने विचारधारात्मक आग्रहों को लेकर पहले की तरह बचाव की मुद्रा में न रहे. इसका सबूत कश्मीर के मुद्दे पर संसद में दिए गए गृह मंत्री अमित शाह के वक्तव्य से मिलता है. ध्यान रहे कि अपने पिछले शासनकाल में भाजपा ने महबूबा मुफ्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ समझौता करके जम्मू-कश्मीर में सरकार गठित की थी. इसके लिए उन दोनों ने एक संयुक्त कार्यक्रम तैयार किया था जिसमें भाजपा की तरफ से स्पष्ट वायदा था कि वह धारा 370 के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगी. 

आज वही भाजपा संसद के मंच से देश को संदेश दे रही है कि धारा 370 दरअसल एक अस्थायी प्रावधान है जिसे खत्म किया जा सकता है. आज की तारीख में यह समझना आसान है कि भाजपा किस तरह से दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत का जुगाड़ करके यह संविधान संशोधन करवा ले जाएगी. और, अगर उसने ऐसा कर लिया, तो कश्मीर घाटी से बाहर उसकी टोपी में एक बड़ी और भव्य कलगी लग जाएगी. लेकिन, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कश्मीर में आतंकवाद धारा 370 की देन नहीं है. अस्सी के दशक के आखिरी दौर से आतंकवाद शुरू हुआ था, जबकि यह धारा तो शेख अब्दुल्ला के समय से है. इसलिए, संभवत: धारा खत्म करने से पहले मोदी और शाह का फोकस आतंकवाद की कमर तोड़ने पर ज्यादा होगा. 

इसी तरह से रामजन्मभूमि मंदिर का सवाल है. इसे बनवाना तो मोदी सरकार के लिए धारा 370 हटाने से भी ज्यादा आसान है. धीरे-धीरे करके बहुसंख्यकवादी राजनीति हमारे लोकतंत्र की चालक-शक्ति बन गई है, और उसके रुतबे के तहत माहौल कुछ ऐसा बन गया है कि कोई भी राजनीतिक शक्ति राम मंदिर बनवाने का विरोध नहीं कर सकती. अब देखना यह है कि मोदी सरकार यह काम कब और कैसे करती है, और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका इस पूरे प्रकरण में किस प्रकार संसाधित होती है. मेरा विचार है कि अगर धारा 370 हटा दी गई, और राम मंदिर बनने की शुरुआत करवा दी गई, तो फिर नोटबंदी जैसी एक दर्जन गलतियां करने के बावजूद लोग मोदी को तीसरा कार्यकाल देने के लिए तैयार हो जाएंगे. ध्यान रहे कि अगर मोदी चाहते तो 2019 का चुनाव भी राम मंदिर के मुद्दे पर लड़ सकते थे. संघ परिवार उन्हें यह मुद्दा बना कर थमाने के लिए तैयार था. 

पर, मोदी ने संघ की बात नहीं मानी और इस मुद्दे से जो काम लेना चाहिए था, वह उन्होंने बालाकोट एयर स्ट्राइक से लेना पसंद किया. इसीलिए कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि मोदी हिंदुत्व की राजनीति तो कर रहे हैं, पर उनकी शैली और उनकी प्राथमिकताएं वे नहीं हैं जो संघ परिवार उन्हें थमाना चाहता है. मसलन, मोदी के उभार से पहले अयोध्या हिंदुत्व की राजनीति के केंद्र में रहता था. पर मोदी पांच साल में एक बार भी अयोध्या नहीं गए. चुनाव के दिनों में भी नहीं. जबकि, अयोध्या से परे जा कर उन्होंने देश के राजनीतिक-धार्मिक मानस पर बनारस या वाराणसी या काशी की छवि अंकित करने की भरपूर कोशिश की. काशी वे अनगिनत बार गए. क्या केवल इसलिए कि वे वहां से चुनाव लड़ते हैं? अगर अयोध्या की जगह काशी के बढ़ते हुए महत्व को हम इस निगाह से देखेंगे, तो शायद हम मोदी की संघ परिवार से भिन्न प्राथमिकताओं को डिकोड करने में चूक जाएंगे. 

मेरा मानना है कि भाजपा की सांस्कृतिक राजनीति के बारे में सोचते हुए हमें कुछ बातों पर निगाह रखनी चाहिए. पहली, सांस्कृतिक राजनीति तो भाजपा और संघ परिवार मोदी के पहले से कर रहे हैं, लेकिन उसे सफलता इस दौरान ही क्यों मिल रही है? दूसरी, मोदी और संघ परिवार के मित्रतापूर्ण अंतर्विरोध कौन-कौन से हैं? दोनों की प्राथमिकताओं के बीच अंतर क्या है? दोनों के पास अपनी-अपनी रणनीतियां हैं लेकिन किस रणनीति को मैदान में आजमाया जा रहा है?


Web Title: rss preferences and narendra modi, bjp
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