Rajesh Badal's blog: Coronavirus in India Infected top minister and celebrity how public Can be saved | राजेश बादल का ब्लॉग: सियासत में शिखर संक्रमण के गंभीर संकेत
गृह मंत्री अमित शाह (फाइल फोटो)

कहावत है कि बचाव इलाज से अच्छा है. लेकिन हिंदुस्तान की सियासत में शिखर नेताओं में कोरोना-संक्रमण का विस्तार इस बात का संकेत है कि इस महामारी से बचाव और सतर्कता के उपायों में कहीं न कहीं चूक हुई है. यह एक तरह से हमारी स्वास्थ्य सेवाओं पर भी सवाल है कि अत्यंत विशिष्ट और मुल्क की लोकतांत्रिक सेहत के लिए आवश्यक राजनेताओं की तबीयत का ख्याल रखने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्न की अपनी सेहत कैसी है. 

कमोबेश सभी शिखर पुरुष अपने इलाज में निजी संस्थाओं पर भरोसा कर रहे हैं. इसका अर्थ यह भी निकाला जा सकता है कि सरकारी चिकित्सा तंत्न दोयम दज्रे का है और सिर्फ कमजोर तथा गरीब अवाम के लिए ही बनाया गया है.

केंद्रीय गृह मंत्नी, तमिलनाडु के राज्यपाल, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और हिमाचल के मुख्यमंत्नी और राज्यों के अनेक मंत्रियों तथा नेताओं का इस महामारी की गिरफ्त में आना बचाव तंत्न में नाकामी उजागर करता है. उत्तर प्रदेश की एक कैबिनेट मंत्नी की मौत ने सूबे में खलबली मचा दी है. कई प्रदेशों के स्वास्थ्य मंत्री ही संक्रमित हो जाएं तो आम आदमी किस तरह अपने को इस लाइलाज मर्ज की जकड़ में आने से रोक सकता है. 

भारत के सबसे अमीर सुपरस्टार भी जब अस्पताल में दाखिल हो जाएं तो करोड़ों दिलों में घबराहट स्वाभाविक है. वे सोचते हैं कि जब बड़े-बड़े कुबेरों की दौलत उन्हें इस वैश्विक महामारी से नहीं बचा सकी तो आर्थिक दृष्टि से निर्बल इंसान कैसे बच सकता है. ऐसे ही अवसरों पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन और नीति की कमजोरी भी सामने आती है. केवल बाढ़, भूकंप से सुरक्षा करना ही इस आपदा प्रबंधन तंत्न का काम नहीं है.

दरअसल संविधान हर नागरिक को उत्तम स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने का वादा करता है. सरकार और समूचे प्रतिपक्ष का यह संवैधानिक फर्ज है. हालिया दशकों में देखा गया है कि बुनियादी स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार मुहैया कराने के दायित्व से हुकूमतें हटती जा रही हैं. आबादी बढ़ती गई और जिम्मेदारी घटती गई. सरकारी अस्पतालों और मानसिक सेहत मजबूत बनाने वाले स्कूलों की ओर उदासीनता दिखाने का नतीजा यह निकला कि निजी क्षेत्न ने इसे कारोबार बना लिया और सरकारों ने इसे बढ़ावा दिया. 

धीरे-धीरे निजी तंत्र विराट होता गया और शासकीय ढांचा बौना होता गया. प्राइवेट सेक्टर चूंकि व्यापार कर रहे हैं इसलिए वे ऐसी दुकान बनकर रह गए, जो सिर्फ पैसे वालों के काम आती है. जिसकी जेब में पैसा, उसकी दुकान. शिखर राजनेता प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं और आम आदमी सरकारी अस्पतालों में जाने से डरने लगा है. अब मान्यता है कि सरकारी अस्पताल  जाना यानी बीमारी लेकर लौटना. लोकतंत्न में नागरिक यह सोचने लगें तो इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है.

यह भी सच है कि किसी भी देश को गांधी और नेहरू बार-बार नहीं मिला करते. वे बरसों तक हिंदुस्तान की धरती में पकते हैं और आकार लेते हैं. इसके बाद ही वे घर-घर में प्रतिष्ठित होते हैं. इसी तरह सियासत में प्रधानमंत्नी और उनकी कैबिनेट के सदस्य, राज्यों में राज्यपाल, मुख्यमंत्नी और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी होते हैं. वे लंबे संघर्ष, तपस्या और कड़ी मेहनत के बाद ही नेतृत्व के योग्य बनते हैं. कोई भी इंसान दो-चार साल में ही गृह मंत्नी या मुख्यमंत्नी नहीं बन जाता. इसलिए गणतांत्रिक समाज उनके अनुभव की पूंजी से यक-ब-यक वंचित होना बर्दाश्त नहीं कर सकता और इसे भी दरकिनार नहीं किया जा सकता कि भारतीय राजनीति में जनप्रतिनिधियों को विशाल जनसमूह अथवा मतदाताओं के साथ सघन संपर्क से नहीं रोका जा सकता. 

कोरोना जैसी महामारी के दरम्यान भी नहीं. इस तरह उनके संक्रमित होने पर खतरे की तलवार लगातार लटकी रहती है. अगर स्वास्थ्य तंत्र उन्हें इससे बचाने का प्रभावी उपाय नहीं कर सकता तो आजादी के बाद अब तक के शोध और चिकित्सा अध्ययन बेमानी हैं.

मगर इसका मतलब यह नहीं है कि लीडरों को बचाने का ठेका डॉक्टरों ने ही ले रखा है. अगर कोई जानबूझकर अपने को मौत के मुंह में धकेलना चाहे तो आप कैसे रोक सकते हैं. हमने देखा है कि कोरोना का कहर फरवरी से प्रारंभ हो गया था. चीन में कोरोना विकराल आकार में खड़ा था. इस पड़ोसी देश के अलावा भी बहुत से राष्ट्र कोरोना से लड़ रहे थे. 

ऐसे में भारतीय सियासतदान अपनी राजनीतिक गतिविधियां नियंत्रित नहीं कर रहे थे. सरकारों के बहुमत और अल्पमत में आने का खेल वेग के साथ भारतीय क्रीड़ांगण में चलता रहा. मध्यप्रदेश में जिन विधायकों ने मार्च में सरकार गिराई, वे सार्वजनिक आयोजनों में सक्रिय रहे. उन्होंने चिकित्सकों के निर्देश नहीं माने. अब उनमें से कई विधायक और मंत्नी कोरोना संक्रमित हो रहे हैं. न जाने कितने मतदाताओं के संपर्क में ये संक्रमित राजनेता  आते रहे और उन्हें भी यह महामारी भेंट करते रहे. क्या यह सेहत के साथ आमंत्रित खिलवाड़ नहीं था?

हिंदुस्तान के नेताओं का अपने स्वास्थ्य के बारे में यह भ्रम कब टूटेगा कि मंत्नी, विधायक या सांसद होते हुए वे किसी अभेद्य किले में सुरक्षित हैं और प्रशासन का कवच उन्हें कोरोना से हमेशा बचाता रहेगा? सार्वजनिक गतिविधियों में बिना मास्क लगाए और सामाजिक दूरी की अवहेलना करते उनके फोटो और वीडियो निरंतर प्रचार माध्यमों में आते रहे हैं. ऐसी स्थिति में अवाम के जेहन में यह बात भी आती है कि कोरोना के संदर्भ में जारी सारे दिशा निर्देश क्या सिर्फजनता के लिए हैं. नेता इन कायदे-कानूनों से ऊपर क्यों हैं? संसद या सरकार के बनाए नियमों को जब सत्ता पर काबिज लोग ही तोड़ते हैं तो संदेश अच्छा नहीं जाता. 
कानूनों को तोड़ने वाले चंद हुक्मरान होते हैं. सोचिए! उनसे प्रेरणा लेकर यदि करोड़ों लोग भीड़ की शक्ल में सड़कों पर आकर कानून तोड़ने लगें तो स्थिति कितनी विकट हो जाएगी. इसलिए सियासत और सिस्टम-दोनों को अब सतर्क हो जाना चाहिए.

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