Perception will change on the strength of the campaign: Punya Prasun Bajpai | प्रचार के बल पर बदलेगी धारणा!
प्रचार के बल पर बदलेगी धारणा!

लेखक- पुण्य प्रसून वाजपेयी

आधी रात की आजादी के लोकतंत्न का सच यह भी था कि तब भारत पर कोई कर्ज नहीं था। एक रुपए की कीमत एक डॉलर के बराबर थी। फिर जब 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना लागू हुई और देश बड़े उद्योग, बड़े बांध की दिशा में बढ़ा तो सरकार ने विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया और फिर रुपए की साख भी लगातार कम होने लगी। 1975 तक आते-आते तो एक डॉलर की कीमत 8 रु पए हो गई और 1985 में डॉलर का भाव हो गया 12 रुपए और इक्कीसवीं सदी में कदम रखते ही रु पया वाजपेयी की सत्ता तले 47 से 48 रुपए हो गया। 

दरअसल असल खेल तो पी.वी. नरसिंह राव के उदारीकरण की नीति से शुरू होता है। भारत खुले बाजार की इकोनॉमी को अपनाता है या कहें बाजार के तौर पर दुनिया के सामने भारत को रखने की इकोनॉमी ने एक्सपोर्ट-इंपोर्ट के खेल तले भारत को इतना कमजोर करना शुरू किया कि भारत धीरे-धीरे आयात यानी इंपोर्ट पर ही निर्भर होने लगा। देश में उत्पादन कैसे बढ़ाया जाए, उत्पादन के मद्देनजर गांव को शहरों से कैसे जोड़ा जाए, खेत से फैक्ट्री कैसे जुड़े, जो उत्पादन भी बढ़ाए, बाजार भी पैदा करे और रोजगार भी बढ़े यानी रोजगार उन्मुख उत्पादन जो मेड इन इंडिया के नारे के साथ दुनिया के बाजार में जाए - किसी सत्ता ने सोचा ही नहीं।  दुनिया के लिए भारत सस्ता हो गया और नागरिकों के लिए भारत महंगा होने लगा। मसलन, भारतीय मजदूर सस्ते में। भारतीय जमीन मुफ्त में। खनिज संपदा के मोल कौड़ियों के भाव और हर सत्ता ने विदेशी निवेश के लिए ऐसे ऐसे रास्ते खोल दिए कि देश की संपदा की लूट पर विदेशी कंपनियां मुनाफा बनाती गईं और मुनाफा बना कर चंद भारतीय कंपनियों ने भी खुद को बहुराष्ट्रीय बना लिया। यानी भारतीय जमीन पर तैयार कौड़ियों के मोल का उत्पाद दुनिया के बाजार में खासा मुनाफा दे देता। भारत को दुनिया के बाजार से माल खरीदना है तो डॉलर चाहिए और इसी दौड़ में उन देशों की करेंसी आगे बढ़ने लगी जिनका माल दुनिया के बाजार में बिकता। वो करेंसी कमजोर होने लगी जिसका चलन दुनिया के बाजार में नहीं है। तो भारत की जरूरतें डॉलर पर टिक गईं और रुपया सिर्फ घरेलू लेन-देन की जरूरत बना दिया गया।

 हालात से निपटने के लिए रिजर्व बैंक विदेश से डॉलर खरीदकर रखता तो है जो फिलहाल ठीक ठाक है। पर सवाल है कि उत्पादन हो नहीं रहा हो, अपनी जरूरतों को लेकर भारत दुनिया के बाजार पर निर्भर हो रहा हो और सियासत सत्ता पाने या न गंवाने पर जा टिकी हो तो फिर चुनाव जीतने के लिए भी डॉलर चाहिए क्योंकि विदेशी कंपनियों का दखल कैसे भारतीय चुनाव में बढ़ चुका है ये गूगल, ट्विटर, सोशल मीडिया, विदेशी मीडिया के जरिए प्रचार के जरिए भी समझा जा सकता है जहां पेमेंट डॉलर में करना पड़ता है। यानी सवाल यह नहीं है कि तेल-कोयला-स्टील या सेब-मेवे विदेश से आएंगे तो डॉलर देना होगा तो रुपया और कमजोर होगा, सवाल यह है कि समूचा शेयर बाजार ढहेगा और देश में खड़ा किया जाने वाला इन्फ्रास्ट्रक्चर या इन्फ्रास्ट्रक्चर पर चलता देश रुपए के भरोसे चलेगा तो जरूर पर आम जनता की जिंदगी तहस-नहस करके।  

प्रधानमंत्नी की हर योजना की सफलता दिखाने के लिए नीति आयोग के पास शानदार आंकड़े हैं। भाजपा न सिर्फ रईस पार्टी है बल्कि दूसरे राजनीतिक दलों की कमाई पर ब्रेक लगा चुकी है। फिर सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर जो छोटे छोटे क्षत्नप वोट बैंक साथ लिए चलते हैं जब वह साथ हैं तो फिर क्या गम है। यानी मोदी-अमित शाह की जोड़ी को क्यों लगे कि वह 2019 का चुनाव नहीं जीतेंगे। पर जमीन पर अगर परसेप्शन बदल रहा है क्योंकि सिर्फ नीति आयोग के सीईओ यानी अमिताभ कांत के आंकड़े के आसरे हर योजना की सफलता देखी जा रही है तो फिर अगला सवाल यह भी होगा कि तब विकल्प क्या है?  चुनावी बरस है कोई नया आर्थिक रास्ता और उलझाएगा। नीति आयोग के आंकड़ों को प्रचार-प्रसार में झोंक कर उसी आसरे कहा जाएगा कि रोजगार की कमी नहीं। किसान खुश हैं। मजदूरों को न्यूतम मजदूरी मिलती है। मनरेगा ज्यादा सफल है जबकि दूसरी तरफ एफडी सबसे निचले स्तर पर है।  एलआईसी का पैसा भी बैंक रिकवरी के लिए देने का निर्णय डराने लगा है। कैंपस इंटरव्यू से नौकरी मिलने में 50 फीसदी कमी आ गई है। उच्च शिक्षा के लिए देश छोड़ने वाले छात्रों की तादाद 30 फीसदी बढ़ गई है। तो फिर प्रचार काम करेगा या परसेप्शन!


Web Title: Perception will change on the strength of the campaign: Punya Prasun Bajpai
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