Pawan Verma blog: Do not tolerate glorification of Gandhi murderer | पवन के. वर्मा का ब्लॉग: गांधीजी के हत्यारे का महिमामंडन बर्दाश्त न करें
पवन के. वर्मा का ब्लॉग: गांधीजी के हत्यारे का महिमामंडन बर्दाश्त न करें

नई दिल्ली में 30 जनवरी 1948 को शाम के पांच बजने के कुछ ही देर बाद, नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी के कमजोर शरीर पर तीन गोलियां दागीं. कुछ ही क्षणों में दुनिया में शांति के सबसे महान मसीहाओं में से एक धरती पर बेजान पड़ा हुआ था. यह एक ऐसा अपराध था जिसने दुनिया की अंतरात्मा को झकझोर दिया था. देश किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया, दुनिया अनाथ हो गई. लेकिन आज प्रज्ञा सिंह ठाकुर, जो भोपाल से भाजपा सांसद चुनी गई हैं, गोडसे का एक देशभक्त के रूप में जिक्र करती हैं. 

उन्होंने ऐसा एक नहीं बल्कि दो-दो बार किया. दूसरी बार लोकसभा के सदन में कहा और ऑन रिकॉर्ड कहा. अध्यक्ष ने भले ही उनकी टिप्पणी को सदन की कार्यवाही से हटा दिया हो, उन्होंने जो कहा उसे सदन ने सुना. उनकी यह लचर सफाई कि उन्हें गलत समझा गया है, किसी के भी गले नहीं उतरी, उनकी अपनी पार्टी के सदस्यों के भी नहीं. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने उनकी टिप्पणी की निंदा की. उन्हें रक्षा मंत्रलय की सलाहकार समिति से निकाल दिया गया और कहा जाता है कि पार्टी उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की योजना भी बना रही है.

प्रज्ञा ठाकुर ने जो कहा वह इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि वे एक आतंकी मामले में आरोपी थीं. यह इसलिए खतरनाक है क्योंकि वे एक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती हैं. गोडसे को देशभक्त बताने के लिए किस तरह की घृणास्पद, सांप्रदायिक और कुटिल विचार प्रक्रिया को जिम्मेदार होना चाहिए? यह एक ऐसा सवाल है जिसका भाजपा को निश्चय ही सामना करना चाहिए. 

यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह काफी स्पष्ट लगता है कि प्रज्ञा जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती हैं, उसके समर्थन में पार्टी में कई लोग हैं. यहां तक कि जब उन्होंने सदन के पटल पर अपनी निंदनीय टिप्पणी की तो कुछ भाजपा सांसदों ने इसे सही ठहराने की कोशिश की. भाजपा की एक विभूति ने तो यहां तक कहा कि गोडसे को गुमराह किया गया, लेकिन यह असंदिग्ध है कि वह देशभक्ति से प्रेरित था. इसके पहले भी ऐसे मौके आए हैं जब हमने साक्षी महाराज जैसे लोगों को गोडसे के समर्थन में बयान देते सुना है.

इसलिए समय आ गया है कि भाजपा इस मुद्दे पर सफाई दे. यदि वह मानती है कि प्रज्ञा ने जो कहा वह गलत है तो पार्टी को उनके खिलाफ ऐसी कार्रवाई करनी चाहिए जो उदाहरण पेश करे. उनके द्वारा बेमन से मांगी गई माफी से काम नहीं चलेगा, और न ही दिखावटी अनुशासनात्मक कार्रवाई से. मामला सदन की आचार समिति को भेजा जाना चाहिए और उसकी सिफारिशों पर उन्हें लोकसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित करना चाहिए. 

इसके अलावा, भाजपा को उन्हें पार्टी से भी निष्कासित करना चाहिए. केवल तभी पार्टी के भीतर या पार्टी से जुड़े संगठनों में यह सीधा मुखर संदेश जाएगा कि इस तरह की घृणित विचारधारा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. लंबे समय से, हिंसक, विभाजनकारी और अभद्र भाषा का प्रयोग करने वालों के साथ भाजपा द्वारा नरमी बरती गई है. कुछ समय पहले एक अन्य तथाकथित साध्वी, निरंजन ज्योति ने अपने सार्वजनिक भाषण में बेहद आपत्तिजनक बात की थी.  

पहली बार जब प्रज्ञा ने गोडसे को देशभक्त कहा था तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरा खेद व्यक्त किया था. उन्होंने कहा था कि ‘मैं कभी भी उन्हें मन से माफ नहीं कर पाऊंगा.’ अब जब प्रज्ञा ने अपना अपराध दोहराया है, और वह भी संसद में, तो प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए? चूंकि प्रज्ञा के पहले के वक्तव्य पर उन्होंने एकदम स्पष्ट प्रतिक्रिया व्यक्त की थी, और प्रज्ञा ने - प्रधानमंत्री की पीड़ा के बावजूद -  अपने निंदनीय विचारों को दोहराया है, तब क्या प्रधानमंत्री को स्वयं अपनी सार्वजनिक रूप से दर्शाई गई पीड़ा के अनुसार, यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि प्रज्ञा को ऐसा प्रतिफल मिले जो मिसाल बने?

यह विशेष रूप से प्रासंगिक है क्योंकि यह महात्मा गांधी का 150वां जयंती वर्ष है. सरकार ने इसे धूमधाम से मनाया है. गांधीजी की विरासत और उनकी निरंतर प्रासंगिकता को विश्वास और प्रतिबद्धता के रूप में पेश किया जा रहा है. इन प्रयासों में प्रधानमंत्री सबसे आगे हैं. अनगिनत मंचों से उन्होंने महात्मा की महानता का बखान किया है और सरकार के कई प्रमुख कार्यक्रम - जैसे स्वच्छ भारत - विशेष रूप से गांधीजी के नाम पर चलाए जा रहे हैं. ऐसी पृष्ठभूमि में, जब उनकी पार्टी का एक सांसद महात्मा के हत्यारे को देशभक्त के रूप पेश करे - और इस बात को दूसरी बार भी दोहराए - तो प्रधानमंत्री से सिर्फ यही उम्मीद की जाती है कि वे व्यक्तिगत रूप से इस मामले में हस्तक्षेप करें और सुनिश्चित करें कि उपयुक्त सजा मिले.

एक राष्ट्र के रूप में भारत तभी बचेगा, जब वह उस घृणा, हिंसा और संकीर्णता का दृढ़तापूर्वक सामना करेगा, जो अभी भी हमारे सामाजिक ताने-बाने में झलक रहे हैं. प्रज्ञा के खिलाफ अगर सख्त और मिसाल पेश करने वाली कार्रवाई नहीं की गई तो इससे नफरत और हिंसा की ताकतें मजबूत होंगी. प्रधानमंत्री को कार्रवाई के माध्यम से अपनी सख्ती दिखानी चाहिए. अन्यथा यह धारणा जोर पकड़ लेगी कि जिसे वह माफ नहीं करते, उसकी अनदेखी करते हैं.

Web Title: Pawan Verma blog: Do not tolerate glorification of Gandhi murderer
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