indian gdp: Good figures versus public mood | जीडीपी के ताजा आंकड़ों से बढ़ा है बीजेपी सरकार का उत्साह, चुनाव से 8 महीने पहले मिली बड़ी खुशखबरी
जीडीपी के ताजा आंकड़ों से बढ़ा है बीजेपी सरकार का उत्साह, चुनाव से 8 महीने पहले मिली बड़ी खुशखबरी

आंकड़े बता रहे हैं कि नए वित्त वर्ष की पहली तिमाही में हमारा कुल घरेलू उत्पाद 8.2 फीसदी की दर से बढ़ा। यह एक आकर्षक आंकड़ा है। उस समय यह और भी आकर्षक लगने लगता है जब कारखाना उत्पादन (मैन्युफैक्चरिंग) और खेती के क्षेत्र की वृद्धि दर में खासा उछाल दिखाई देता है। जाहिर है कि सरकार उम्मीदों से भर गई है। उसे लग रहा है कि चुनावी साल में अगर अर्थव्यवस्था में चमक आ गई तो उसका अनुवाद वोटों में हो सकता है। 

नरेंद्र मोदी एंड कंपनी को पता है कि कांग्रेस द्वारा 2009 के चुनाव में बेहतरीन जीत दर्ज करने के पीछे मौजूद प्रमुख कारणों में नौ से दस फीसदी वृद्धि दर हासिल करने का भी एक कारण था। ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ द्वारा बनाए गए एक मॉडल से एक मोटा-मोटा अंदाज लग सकता है कि आर्थिक वृद्धि का राजनीतिक सफलता से क्या रिश्ता है। यह मॉडल बताता है कि अगर कोई सरकार पिछली सरकार की वृद्धि दर को पछाड़ देती है, तो उसके चुनाव जीतने की संभावना 60 प्रतिशत हो जाती है। प्रश्न यह है कि क्या मोदी सरकार कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार की वृद्धि दर से अधिक आर्थिक प्रगति करके दिखा सकती है? पांचवें साल की पहली तिमाही के उत्साहवर्धक आंकड़ों से सरकार के समर्थकों को लगने लगा है कि ऐसा हो सकता है। 

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि मोदी सरकार के पांच साल पूरे होने पर 7.3 प्रतिशत की वृद्धि दर का औसत निकलेगा। अगर इसकी तुलना कांग्रेस सरकार के दूसरे पांच साल के वृद्धि दर औसत से करें तो पता लगता है कि उस समय अर्थव्यवस्था 7.39 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी। यानी पहली नजर में नहीं लगता कि मोदी सरकार इस मामले में मनमोहन सरकार को पछाड़ सकती है। 

पहली तिमाही के आधार पर सरकारी विशेषज्ञों का भी यही अनुमान है कि 2018-19 की वृद्धि दर 7.5 प्रतिशत से ऊपर नहीं होगी। इस पर भी शर्त यह है कि अगली तिमाहियों में भी आर्थिक वृद्धि का यही जोश बना रहे। आंकड़ों की इस कवायद से इतना तो साफ हो ही जाता है कि मोदी को 2019 में अर्थव्यवस्था बहुत बेहतरीन ढंग से चलाने के बदले कोई खास वोट नहीं मिलने वाले हैं। हालांकि चुनाव जीतने या हारने के पीछे केवल आर्थिक ही नहीं बल्कि कई तरह के कारण होते हैं।  

यहां आखिरी सवाल यह उठता है कि जनता का मूड इस समय कैसा है? क्या जनता प्रसन्न है, और उसे लग रहा है कि इस सरकार के नेतृत्व में उसका आर्थिक भविष्य बेहतर होने वाला है? आंकड़े तो कम-से-कम ऐसा कोई संदेश नहीं देते। इस तरह सरकार के पास कहने के लिए और भरोसा करने के लिए उज्ज्वला योजना, शौचालय योजना और ग्रामीण आवास योजना जैसी पहलकदमियां रह जाती हैं। इनका महत्व कम करके नहीं आंकना चाहिए, लेकिन क्या केवल इनके दम पर एक पूरा चुनाव जीता जा सकता है? अक्टूबर-नवंबर आ रहा है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मतदाता हमें यह बताएंगे कि जनता के मूड को हमें कैसे पढ़ना चाहिए।


Web Title: indian gdp: Good figures versus public mood
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