India and America maritime region united nation china sea ved pratap vaidik blog | भारत के समुद्री क्षेत्र में अमेरिका की दादागीरी, वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग
देश के आर्थिक क्षेत्र में अपनी गतिविधियों के लिए तटवर्ती राष्ट्र की अनुमति आवश्यक नहीं है. (file photo)

Highlightsअमेरिका ने किसी अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं किया है बल्कि भारतीय दावे अनाप-शनाप हैं. भारत अमेरिकी चौगुटे का महत्वपूर्ण सदस्य है.मौके पर अमेरिका को यह विवाद खड़ा करने की जरूरत क्या थी?  

भारत और अमेरिका के बीच आजकल जैसा मधुर माहौल बना हुआ है, उसमें अचानक एक कड़वा प्रसंग आन पड़ा है.

 

हुआ यह है कि अमेरिकी नौसेना का सातवां बेड़ा हमारे  सामुद्रिक अनन्य आर्थिक क्षेत्न में घुस आया है और सरकार ने इस सीमा-उल्लंघन पर अमेरिकी सरकार से शिकायत की है. लेकिन अमेरिका ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि अमेरिका ने किसी अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं किया है बल्कि भारतीय दावे अनाप-शनाप हैं.

अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के समुद्री कानून के अनुसार ही भारत के 370 किमी के समुद्री क्षेत्न में अपना जंगी बेड़ा भेजा है. उसने कहा कि लक्षद्वीप के पास के इस क्षेत्न में अपनी गतिविधि के लिए अमेरिका को किसी तटवर्ती देश की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है.

यही काम अमेरिका दक्षिण चीनी समुद्र में कर रहा है. दूसरे शब्दों में अमेरिका चीन को यह बताना चाह रहा है कि चीन के साथ वह वही बर्ताव कर रहा है, जो वह अपने मित्न भारत के साथ कर रहा है. भारत अमेरिकी चौगुटे का महत्वपूर्ण सदस्य है, इसके बावजूद इस मौके पर अमेरिका को यह विवाद खड़ा करने की जरूरत क्या थी?  

यदि भारत के आर्थिक क्षेत्न में आने के पहले अमेरिका भारत को सूचना-भर भी दे देता तो यह विवाद शायद उठता ही नहीं. लेकिन अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के समुद्री कानून का हवाला देते हुए कहा है कि उसकी धारा-58 में साफ लिखा है कि किसी भी देश के आर्थिक क्षेत्र में अपनी गतिविधियों के लिए तटवर्ती राष्ट्र की अनुमति आवश्यक नहीं है.

हां, तटवर्ती राष्ट्र की सिर्फ12 मील की समुद्री सीमा में ही उसकी संप्रभुता रहती है. यह कानून 1982 में बना था. इस पर भारत ने 1995 में दस्तखत किए थे. 168 देशों ने इसे स्वीकार किया है लेकिन अमेरिका ने अभी तक इस पर अपनी मुहर नहीं लगाई है. इसके बावजूद अमेरिका का कहना है कि वह इस कानून का वैसे ही सम्मान करता है, जैसे कि भारत परमाणु अप्रसार संधि आदि का समर्थन करता है.

अर्थात अमेरिका इस समुद्री कानून को मानने या न मानने में स्वतंत्न है. जबकि इसी कानून की धारा-88 कहती है कि ‘खुला समुद्र शांतिपूर्ण गतिविधियों के लिए सुरक्षित’ रहना चाहिए. भारत का जोर इसी लक्ष्य पर है. आश्चर्य तो यह है कि एक तरफ अमेरिका सुदूर-पूर्व के समुद्र को ‘हिंद-प्रशांत’ नाम दे रहा है और दूसरी तरफ हिंद महासागर में भारत का लिहाज नहीं कर रहा. यह कैसी दादागीरी है?

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