coronavirus pandemic and depleting condition of public heath sector in india | विचार: कोरोना महामारी से उपजी मानवीय विपदा की इस घड़ी में अब तो सब एकजुट हों 
कोरोना मरीज की प्रतीकात्मक तस्वीर

आजकल नए-नए अकल्पनीय दृश्यों  के साथ हर दिन का पटाक्षेप हो रहा है. कोरोना पीड़ितों की बेशुमार होती संख्या के साथ मृत्यु का अनियंत्रित तांडव खौफनाक होता जा रहा है. इसका व्यापक अस्तित्व किसी के बस में नहीं है, पर इसके समाधान के लिए जो करणीय है उसको देख सुनकर यही लगता है कि हम वह सब ठीक ढंग से नहीं कर पा रहे हैं जो इस दौरान जरूरी था.  इस बीच हमने बहुतों को खो दिया. 

यह सब तब हुआ जब स्पेन, इटली, ब्राजील और अमेरिका जैसे देशों के खौफनाक मंजर सारी दुनिया के सामने थे, चिकित्सा विज्ञान के शोध अनुसंधान के परिणाम भी थे और भारत की तैयारी की जानकारी क्या है, यह भी मालूम थी. यह जरूर है कि स्थिति की भयानकता का शायद अच्छी तरह पूर्वानुमान नहीं लगाया गया था. देश की और अधिकांश प्रदेशों की सरकारें विजयी मुद्रा में नजर आ रही थीं और कई जगह चुनाव का अश्वमेध यज्ञ छिड़ा हुआ था. जिस गहनता और गंभीरता से चुनाव को लिया गया, वह मीडिया की बदौलत सार्वजनिक होता रहा है और सभी ने उसका जायजा लिया है. इस दौरान समाज के स्वास्थ्य के लिए आसन्न संकट को ध्यान में रख कर जो तैयारी और निगरानी होनी चाहिए थी वह नहीं हो सकी.

जन-स्वास्थ्य को लेकर आने वाले सरकारी बयान अक्सर सबको आश्वस्त करने वाले लगते थे और धीमे-धीमे ही सही, टीकाकरण की ओर हम आगे बढ़ने की कोशिश में लगे दिख रहे थे. विदेशों को उपहार में टीकों की खेप पहुंचाते हुए यही लग रहा था कि घर में तो टीकों की व्यवस्था होगी ही. पर जब कोविड की आक्रामक भयावहता सामने आई तो दवा की उपलब्धता, अस्पताल की पर्याप्तता और टीके की व्यवस्था-  सभी को लेकर हमारी तैयारियां अधूरी और नाकाफी साबित हुईं. पर इनसे भी कठिन और बर्दाश्त के बाहर की स्थिति ऑक्सीजन की आपूर्ति को लेकर पैदा हुई जब अस्पतालों में आईसीयू में इलाज के लिए भर्ती मरीज मरने लगे और यह सिलसिला अभी भी जारी है. 

स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण का प्रकोप

आज के कठिन दौर में स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के चलते आम आदमी के लिए सस्ती और सुविधाजनक स्वास्थ्य की व्यवस्था नसीब नहीं है. आज बढ़ते तनाव और दबाव के माहौल में जब आर्थिक संसाधन भी सिमटते जा रहे हैं, बेरोजगारी और महंगाई बढ़ती जा रही है व आम आदमी के लिए स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा पहेली बनती जा रही है. पर हमारे निर्णय, नीति और उसके अनुपालन का तंत्र किस तरह और किस हद तक सुस्त, अनुत्तरदायी और असंवेदनशील है, इसे लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियों पर नजर डालने की जरूरत है.

हमारा व्यवस्था-तंत्र कुशल कर्म के साथ दक्षता और उत्कृष्टता की जगह भेदभाव, भाई भतीजावाद, चापलूसी, घूस, राजनीतिक हस्तक्षेप आदि के भ्रष्ट तरीकों से ग्रस्त होता जा रहा है. धन लोलुप कालाबाजारिये और दलाल ऑक्सीजन व जीवन रक्षक बनी दवाओं, टीकों और स्वास्थ्य सेवाओं, नागरिक सुविधाओं (जैसे टैक्सी, श्मशान, अस्पताल में प्रवेश) आदि को व्यापार की तर्ज पर ले रहे हैं. हर जगह लूटने का अवसर खोजते नव धनाढ्य चारों और फैल गए हैं और जीने का अवसर आम आदमी के हाथ से निकलता जा रहा है.  

सांसों की यह मुश्किल होती जंग दिन पर दिन डरावनी हो रही है. किसी भी तरह से संसर्ग में आने से अपने आगोश में लेने वाला यह संक्रामक रोग बड़ी एहतियात और संजीदगी के साथ जीने के लिए कहता है. डॉक्टर और नर्स जान जोखिम में डाल  कर दिन-रात सेवा करते हुए जीवन की रक्षा में लगे हैं, फिर भी गैरजिम्मेदाराना हरकत करने वालों की कमी नहीं है. दूसरी तरफ इस राष्ट्रीय संकट की घड़ी में भी विभिन्न राजनीतिक दल अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हुए हैं. यह कहने की आवश्यकता नहीं कि समाज का कल्याण ही सर्वोपरि है. आज सर्वदलीय चर्चा और एकमत से राष्ट्रीय स्तर पर कार्ययोजना बनाने की जरूरत है. हमें यह याद रखना होगा कि यह जिम्मेदारी किसी एक दल की न होकर सबकी है और सबके लिए है. बिना किसी विलंब के इस मानवीय विपदा में सबको एकजुट होकर कार्य करना होगा. 

आज व्यापक टीकाकरण, रोग के उचित निदान और उपचार की व्यवस्था के साथ नागरिक जीवन को सहज बनाने की मुहिम के साथ संक्रमण को रोकने के प्रभावी उपाय भी तत्काल करने होंगे. संक्रमण से दुष्प्रभावित लोगों विशेषत: स्त्रियों और बच्चों के पुनर्वास की व्यवस्था भी जरूरी होगी. इन सब के बीच सकारात्मक बने रहने, व्यायाम करने और संयमित रूप से जीने की शैली अपनाने पर भी जोर देना होगा. यह हमारी इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है कि हम क्या कुछ कर पाते हैं. जीवन संभावनाओं का ही नाम है और यह त्रसदी हमारे साहस और धैर्य के आगे नहीं ठहरेगी.

Web Title: coronavirus pandemic and depleting condition of public heath sector in india

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