Abhay Kumar Dubey blog: Two strategies collide in election battle | अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: चुनावी संग्राम में दो रणनीतियों की टक्कर 
अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: चुनावी संग्राम में दो रणनीतियों की टक्कर 

कांग्रेस अपनी चुनावी रणनीति में राफेल विमान खरीद से जुड़े भ्रष्टाचार के इल्जामों को केंद्रीय महत्व देना चाहती है. ठीक उसी तरह जैसे भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति में पुलवामा का बदला लेने के लिए बालाकोट पर किए गए हवाई हमले को महत्व दिया है. एक तरह से यह चुनाव इन दो रणनीतियों की टक्कर में बदल सकता है. अगर पटना के गांधी मैदान वाले नरेंद्र मोदी के भाषण को देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि वे एयर स्ट्राइक का इस्तेमाल कैसे करने वाले हैं.

गांधी मैदान में पहले उन्होंने पुलवामा के संदर्भ में राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न को चुनावी वितंडे की शैली में पेश किया और फिर उसके बाद पांच साल में शुरू की गई अपनी योजनाओं और उनकी सफलता की दावेदारियों को गिनाने लगे. जाहिर है कि पुलवामा से पहले के उनके भाषणों की सामग्री के शीर्ष पर अब एयर स्ट्राइक आ गई है और बाकी भाषण वैसा ही है. इससे मतलब निकलता है कि जिस जज्बाती मुद्दे की तलाश भाजपा को थी, वह मोदी को मिल गया है. राम मंदिर पर कानून बनाने की मांग करके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसा ही एक जज्बाती मुद्दा मोदी को थमाना चाहता था, जिसे थामने से उन्होंने इंकार कर दिया था.

लेकिन, अब वे वोटरों को राष्ट्रीय सुरक्षा की रूमाली रोटी में लपेट कर विकास का रोल खिलाना चाहते हैं. राहुल गांधी की कोशिश इसी तर्ज पर राफेल खरीदी के विवाद को मोदी सरकार के कामकाज की अपनी आलोचना के शीर्ष पर रखने की है. इसके जरिये वे दिखाना चाहते हैं कि मोदी कार्यकाल न सिर्फ झूठे वायदों का रहा है, बल्कि उसके भीतर राफेल के सौदे के जरिये तीस हजार करोड़ की चोरी भी हुई है. प्रश्न यह है कि जिस तरह से बालाकोट की एयर स्ट्राइक लोकप्रिय ढंग से मोदी की मदद कर रही है, क्या उस तरह से राफेल खरीद का विवाद राहुल गांधी और विपक्ष की मदद करेगा? 

इस प्रश्न का बहुत स्पष्ट उत्तर तो अभी नहीं दिया जा सकता, लेकिन कुछ अंदाजे अवश्य लगाए जा सकते हैं. मसलन, जब सुप्रीम कोर्ट में एटॉर्नी जनरल ने कहा कि रक्षा मंत्रलय से राफेल सौदे की कुछ फाइलें लीक हो गई हैं तो जबरदस्त विवाद पैदा हुआ. देखते ही देखते चैनलों पर बहस होने लगी कि क्या कोर्ट को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इस तरह के मामलों की समीक्षा करने के चक्कर में फंसना चाहिए. जैसा कि होता है, एक फटाफट सर्वेक्षण भी किया गया. दिलचस्प बात यह है कि बहस की शुरुआत में कोर्ट द्वारा समीक्षा का समर्थन करने वालों की संख्या केवल बीस फीसदी के आसपास ही थी.

लेकिन जैसे-जैसे बहस आगे बढ़ी, उनकी संख्या बढ़ने लगी और आखिर में 38 फीसदी लोग इसका समर्थन करते पाए गए. इसमें कोई शक नहीं कि 62 फीसदी लोग फिर भी राफेल के मुद्दे में ऐसी कोई बात देखने के लिए तैयार नहीं थे जिस पर उनकी निगाह में अदालत को ध्यान देना चाहिए. जाहिर है कि 62 और 38 में काफी अंतर है, लेकिन क्या 38 का यह अंक भाजपा और मोदी के प्रशंसकों के लिए चिंताजनक नहीं प्रतीत होता. खास तौर से तब, जब यह आंकड़ा अभी स्थिर न हुआ हो और इसमें मसले के तूल पकड़ने के साथ-साथ धीरे-धीरे ही सही, लेकिन वृद्धि हो रही हो. अगर यह आंकड़ा अगले एक महीने में सात-आठ फीसदी और बढ़ा, तो निश्चित रूप से यह भाजपा के खाते से एक से दो फीसदी वोट छीन सकता है. 

इसी मुकाम पर यह भी समझने की जरूरत है कि पुलवामा और बालाकोट की चुनावी दृष्टि से लाभदायक प्रतीत हो रही घटनाओं ने ठोस रूप से भाजपा को क्या दिया है? कोई भी रणनीति दो स्तरों पर काम करती है. पहली देखने की बात तो यह होती है कि क्या किसी रणनीति से पार्टी के पास पहले से मौजूद समर्थन और सुदृढ़ हो रहा है या नहीं. यानी वह रणनीति वोट छिनने के अंदेशों को निष्प्रभावी कर रही या नहीं. दूसरी देखने की बात यह होती है कि क्या किसी रणनीति में किसी नए समर्थन आधार को पार्टी के खाते में जोड़ने की क्षमता है या नहीं. यानी क्या वह रणनीति कुछ नए वोट ला सकती है या नहीं.

पुलवामा से पहले भाजपा की सारी कोशिश यह थी कि जो समर्थन उसके पास 2014 में था, उसे कायम कैसे रखा जाए. चाहे ऊंची जातियों को दस फीसदी आरक्षण देने का फैसला हो या पांच लाख की आमदनी तक के मध्यमवर्गीय करदाताओं को टैक्स राहत देने की बात हो- ये सभी कदम पहले से मौजूद समर्थन आधार को आश्वस्त करने के लिए उठाए गए थे. 

मोदी के कामकाज की आलोचना और राफेल को मिलाने के बाद कांग्रेस उसके साथ और क्या जोड़ने की स्थिति में है? इस लिहाज से देखें तो कांग्रेस के पास पहले से ही गठजोड़ राजनीति का शक्तिशाली फार्मूला है. पुलवामा के बाद उसे चेतना आई है कि उसे गठजोड़ों का और विस्तार करना चाहिए. इस मामले में वह चाहे तो भाजपा से कुछ सबक भी सीख सकती है.

भाजपा ने बिहार और महाराष्ट्र में जिस तरह झुक कर और थोड़ा घाटा उठा कर गठजोड़ किए हैं, वे उसकी कमजोरी न होकर उसकी रणनीतिक कुशलता के द्योतक हैं. अगर कांग्रेस दिल्ली और उत्तर प्रदेश में इसी तरह का रवैया अपना ले और क्रमश: आम आदमी पार्टी व सपा-बसपा-रालोद गठजोड़ के साथ मिल जाए तो वह भाजपा विरोधी वोटों की गोलबंदी को कहीं ज्यादा खूबी से अंजाम दे सकती है. 


Web Title: Abhay Kumar Dubey blog: Two strategies collide in election battle