Why did India withdraw from 1950 FIFA world cup? | आखिर 1950 में भारत क्यों हटा था फीफा वर्ल्ड कप खेलने से पीछे? 68 साल बाद भी 'अंतहीन' बहस जारी

बात 1948 के लंदन ओलंपिक की है, जब भारत को आजाद हुए महज एक ही साल हुए थे। आजाद देश के तौर पर अपने पहले ओलंपिक में खेलते हुए भारत ने फ्रांस की मजबूत टीम को कड़ी टक्कर दी। हालांकि, भारतीय टीम मैच 1-2 से हार गई, लेकिन नंगे पैर फुटबॉल खेलते (कुछ खिलाड़ी मोजे पहनकर खेले थे) हुए भारतीय खिलाड़ियों ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था। 

इस मैच ने महज दो साल के अंदर भारतीय टीम को फीफा वर्ल्ड कप में एंट्री दिलाने का रास्ता लगभग तैयार ही कर दिया था। जी हां, भारत को 1950 के फीफा वर्ल्ड कप खेलने के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन फिर भी 68 साल बाद अब भी इस बात की चर्चा होती है कि आखिर भारत उस वर्ल्ड कप में क्यों नहीं खेला? इसके पीछे कई कहानियां और दावे हैं लेकिन पूरा सच क्या है ये शायद ही कोई बता पाए। 

क्या नंगे पैर खेलने की वजह से पीछे हटा भारत?

1950 के फीफा वर्ल्ड कप में कुल 16 टीमों को हिस्सा लेना था। फीफा ने साफ कर दिया था कि ब्राजील और इटली को पिछले साल के दो फाइनलिस्ट होने की वजह से खुद-ब-खुद जगह मिल गई थी। बाकी के 14 में से 7 टीमें यूरोप, छह टीमें अमेरिका से चुनी गई। एशिया को एक जगह दी गई, लेकिन किस्मत देखिए एशिया की चार टीमों में फिलीपींस, इंडोनेशिया और बर्मा ने क्वॉलिफाइंग राउंड से पहले ही नाम वापस ले लिए और भारत खुद-ब-खुद वर्ल्ड कप खेलने का दावेदार बन गया। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, और न जाने क्यों भारत ने भी उस वर्ल्ड कप से अपना नाम वापस ले लिया। आखिरी में उस वर्ल्ड कप में सिर्फ 13 टीमें ही खेलीं क्योंकि स्कॉटलैंड और तुर्की ने भी खेलने से मना कर दिया थआ। 

भारत के उस वर्ल्ड कप से पीछे हटने को लेकर कई दावे किए जाते हैं। उनमें से एक अजीबोगरीब तर्क ये दिया जाता है कि उस समय तक भारतीय फुटबॉलर नंगे पैर खेलते थे, जबकि फीफा ने साफ कह दिया था कि खिलाड़ियों को जूते पहनकर खेलना होगा। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जाता है कि उस वर्ल्ड कप से नाम वापस लेने की वजह फीफा की जूतों के साथ खेलने की शर्त थी। हालांकि, ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (AIFF) और उस दौर के कुछ पूर्व खिलाड़ी इन दावों को गलत बताते हैं।

खर्च न उठा पाने की वजह से उठा पीछे हटा था भारत?

भारत के पीछे हटने के पीछे एक तर्क ये भी दिया जाता है कि 1950 का वर्ल्ड कप ब्राजील में खेला जा रहा था। ऐसे में ब्राजील आने-जाने का और बाकी का खर्च उस दौर में भारतीय फुटबॉल टीम के लिए काफी महंगा था, इसलिए उसने अपना नाम वापस ले लिया था। न सिर्फ भारत बल्कि तुर्की ने भी इसी वजह से नाम वापस लिया था। हालांकि, इस तर्क को भी इसलिए सही नहीं माना जा सकता क्योंकि आयोजकों ने भारत से ब्राजील तक की यात्रा के ज्यादातर खर्च के भुगतान का प्रस्ताव रखा था।

भारत ने तब वर्ल्ड कप में खेलने को तवज्जो ही नहीं दी?

स्पोर्ट्स इलेस्ट्रेटेड मैगजीन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ये थी कि AIFF ने वर्ल्ड कप में खेलने को गंभीर से लिया ही नहीं क्योंकि उस समय तक उनके लिए ओलंपिक में खेलना ही सबसे बड़ी बात थी। इस तर्क की पुष्टि उस टीम के स्टार खिलाड़ी रहे सैलेन मन्ना भी करते हैं। उन्होंने इस मैगजीन से कहा था, 'हमें तब वर्ल्ड कप के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, अगर हमें बेहतर ढंग से सूचना दी गई होती तो हम खुद से पहल करते। हमारे लिए तब ओलंपिक ही सबकुछ था, उससे बड़ा कुछ भी नहीं था।'  

यानी, भारत ने वर्ल्ड कप खेलने का सुनहरा अवसर यूं ही जाया हो जाने दिया था। हर कोई इस बात से इत्तेफाक रखता है कि अगर भारत उस वर्ल्ड कप में खेला होता तो भारतीय फुटबॉल टीम की कहानी आज कुछ अलग होती। वो भारतीय टीम के लिए फीफा वर्ल्ड कप में खेलने का पहला और अब तक आखिरी मौका था। 

अब से महज कुछ दिन बाद जब रूस में 21वें फीफा वर्ल्ड कप की शुरुआत होगी तो भारतीय फैंस को ये कमी और ज्यादा खलेगी, क्योंकि उनके पास दूसरे देश का समर्थन करने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं होगा। भारत की वर्तमान फीफा रैंकिंग 97 है, और वर्ल्ड कप में टॉप-32 टीमें ही खेलती हैं, जो दिखाता है कि भारत के लिए अभी मंजिल कितनी दूर है। फीफा ने 2026 से वर्ल्ड कप खेलने वाले देशों की संख्या बढ़ाकर 48 करने को मंजूरी दी है। ऐसे में तब शायद भारत के लिए कुछ मौका बन पाए।

लेकिन तब तक सवा सौ अरब की आबादी वाले देश को 68 साल पहले की उस गलती की वजह से फीफा वर्ल्ड कप में अपने देश को न देख पाने की तकलीफ के साथ ही जीना होगा!