Prasun Vajpayee's view: India did not lose, but lost the cricket! | पुण्य प्रसून वाजपेयी का नजरियाः भारत नहीं हारा, बल्कि क्रिकेट हार गया! 
पुण्य प्रसून वाजपेयी का नजरियाः भारत नहीं हारा, बल्कि क्रिकेट हार गया! 

क्रिकेट विश्व कप से भारत बाहर हो गया. दोष किसका है, किसी का नहीं. सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड ने अपनी फील्डिंग और गेंदबाजी के दम पर भारत को हरा दिया, गलती किसकी है, किसी की नहीं. क्या वाकई हम एक ऐसे दौर में आ चुके हैं जहां अपने-अपने क्षेत्न के नाकाबिल कप्तान हार के बावजूद दोषी नहीं होते हैं? कप्तान विराट कोहली ने शुरुआती 45 मिनट के खेल को दोषी करार देकर दो दिन तक चले न्यूजीलैंड के मुकाबले में हार को महज इत्तेफाक कहकर खामोशी बरत ली और भारत के तमाम लोगों ने मान लिया इससे बेहतर भारतीय टीम हो नहीं सकती.
तो फिर वेलडन बॉयज  के आसरे जश्न में कोई कमी रहनी नहीं चाहिए इसे भी दिखा दिया. 

पीएम से लेकर सीएम तक और कैबिनेट मंत्रियों से लेकर धराशायी विपक्ष के नेताओं ने भी सोशल मीडिया पर टीम इंडिया की हौसलाअफजाई करते हुए हार से कुछ इस तरह मुंह मोड़ा जैसे क्रिकेट के जश्न में कोई खलल पड़नी नहीं चाहिए. आखिर बीसीसीआई दुनिया के सबसे ताकतवर खेल संगठन के तौर पर है जिसका टर्नओवर बाकी नौ देशों के क्रिकेट संगठनों के कुल टर्नओवर से ज्यादा है तो फिर गम काहे का.  आईपीएल में तो सभी को कमाने-खाने भारत ही आना है. फिर भारत फाइनल में नहीं होगा तो लॉर्डस के फाइनल को देखने कौन पहुंचेगा. और विज्ञापन से कमाई भी थम जाएगी. टीवी राइट्स से भी आईसीसी की कमाई में पचास फीसदी तक की कमी आ जाएगी. तो गम काहे का. 

अब भारतीय क्रिकेट प्रेमी रविवार को लॉर्ड्स का फाइनल देखने की जगह विम्बलडन का फाइनल देखेंगे जिसमें नडाल या फेडरर में से कोई तो पहुंचेगा ही. क्योंकि शुक्रवार यानी 12 जुलाई को सेमीफाइनल में यही दोनों टकरा रहे हैं. यानी टीवी पर विज्ञापनों का हुजूम क्रिकेट से निकल कर टेनिस में समा जाएगा. भारतीय कंजुमर या कहें भारतीय बाजार क्रिकेट विश्व कप नहीं, विम्बलडन देख रहा होगा. 

तो पूंजी, बाजार, जश्न, जोश जब चरम पर हो और उस पर राष्ट्रवाद चस्पा हो तब क्रिकेट का मतलब सिर्फ खेल नहीं बल्कि देश को जीना होता है और देश कभी हारता नहीं. देश तब भी नहीं जीतता जब मुनाफे और चकाचौंध के क्रिकेटिया शोर में भारत की ही एक बेटी 100 मीटर फर्राटा दौड़ में पूरे विश्व को झकझोर देती है.  ओडिशा की दुती चंद इटली के नैपल्स में वल्र्ड यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में सबको पीछे छोड़ देती है. लेकिन अपने ही देश में हारे हुए विराट-धोनी से हार जाती है. तो हार कर भी भारतीय टीम हारी नहीं है ये सोच जगाकर जरा सोचना शुरू कीजिए आखिर हुआ क्या जो भारतीय टीम हार गई. 

कहीं कप्तान की कप्तानी का अंदाज कुछ ऐसा तो नहीं हो चला था जहां वह जो करे वही ठीक. क्योंकि पहले चालीस मिनट में रोहित और राहुल के साथ विराट भी पवेलियन वापस लौट आए थे. यहीं से शुरू  होता है कि आखिर कप्तान का मतलब होता क्या है? तीन विकेट गिरने के बाद कार्तिक की जगह धोनी क्यों नहीं मैदान में उतारे गए, कोई नहीं जानता. फिर ऋषभ पंत पर भरोसा विश्व कप के बीच में क्यों जागा और भारतीय क्रिकेट टीम के इतिहास में तीन विकेटकीपर टीम इलेवन में खेल रहे हैं यह भी अपनी तरह का नायाब दौर रहा. 

जडेजा इंग्लैंड के खिलाफ क्यों मैदान में नहीं थे और शमी झटके में कैसे बाहर हो गए, कोई नहीं जानता. यानी चालीस मिनट में ढही टीम इंडिया के कप्तान के पास प्लान बी क्या था? ये सबकुछ जानते हुए भी कोई नहीं जानता क्योंकि हर किसी को याद होगा विश्व कप से पहले जब तमाम टीम आपस में वार्म-अप मैच खेल रही थीं तब भी न्यूजीलैंड के खिलाफ भारतीय टीम ऐसे ही ढही थी. तब कोहली ने मौसम को दोष दिया था और उसके बाद कोहली ने टीम इलेवन को लेकर जो सोचा वह किया. फिर कोच रवि शास्त्नी की नियुक्ति तक पर जब कप्तान कोहली की चलने लगी हो तब मान लीजिए भारतीय क्रिकेट अपने अहंकार के चरम पर है. और हुआ यही है कि कप्तान की मनमर्जी या भारतीय क्रिकेट फैन्स का दीवानापन या बीसीसीआई की रईसी या फिर क्रि केट को धर्म मानते हुए सचिन को भगवान मानने की पुरानी रीत के आगे अब क्रिकेट का जुनून छद्म राष्ट्रवाद में समा चुका है जिसे कोई खोना नहीं चाहता. 18 राज्यों के सीएम, देश के सोलह कैबिनेट मंत्नी और विपक्ष से लेकर क्षत्नपों की एक कतार भारतीय टीम को ढाढस इसलिए बंधाती है क्योंकि उसे पता चल चुका है अब कप्तान के होने का मतलब क्या है. 

लोकतंत्न की परिभाषा भी जब सत्तानुकूल हो चुकी होगी तो फिर कर्नाटक या गोवा में पाले बदलने से लेकर पाला बदलने से रोकने वालों को ही मुबंई के होटल के बाहर पुलिस गिरफ्तार करने से चूकेगी नहीं. यानी विकल्प हर किसी के पास कम हो चले हैं. राजनीति कहती है या तो सत्ता के साथ आ जाओ तमाम सुविधा मिलेगी. नहीं आओगे तो जांच एजेंसी आपके दरवाजे पर खड़ी है. खेल कहता है, कप्तान के साथ खड़े हो जाओ तो सभी खेलते रहेंगे. नहीं तो अंबाती रायडू की तरह संन्यास लेना पड़ेगा. और फैन्स कहते हैं, इंडिया, इंडिया. बाकी आप जो सोचते नहीं उसका कोई मतलब नहीं है, क्योंकि देश मान चुका है कि भारत हारा नहीं है क्रिकेट हारा है. विश्व कप में भारत नहीं है तो पैसा लगाएगा कौन? सट्टा लगेगा किस पर और कितना लग पाएगा, विज्ञापन देगा कौन? और दुनियाभर में शोर मचाएगा कौन?  भारत में हर खेल को हड़प चुके क्रि केट में भारत न हो तो कुछ भी नहीं है.


Web Title: Prasun Vajpayee's view: India did not lose, but lost the cricket!
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