Rahees singh blog: Rupee depreciation of the economy | अर्थव्यवस्था की सेहत को बयां कर रहा रुपया
अर्थव्यवस्था की सेहत को बयां कर रहा रुपया

रहीस सिंह 

भारतीय रुपए ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक गिरावट दर्ज कराई है और मुद्रा बाजार की आशाओं व निराशाओं के बीच डॉलर के मुकाबले गिरकर रुपया साढ़े तिहत्तर से भी निचले स्तर को छू गया। हालांकि वर्ष 2013 में जब रुपए में गिरावट आई थी तब नरेंद्र मोदी ने अपने ट्वीट में लिखा था कि रुपया आईसीयू में है और उन्होंने इसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ़ मनमोहन सिंह को दोषी ठहराया था। लेकिन अब वे स्वयं यह दायित्व निभाने से पीछे हट गए और मौन रहना ही सबसे अधिक उचित मान रहे हैं। यही नहीं वित्त मंत्री भी आजकल अपने दायित्व में अर्थव्यवस्था को शामिल नहीं मान रहे हैं वे राफेल सहित कुछ अन्य विषयों पर ब्लॉग लिखने में व्यस्त हैं। 

नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कुछ समय पहले अवश्य टिप्पणी की थी लेकिन यह टिप्पणी सरकार के एक प्रवक्ता की तरह थी न कि एक अर्थशास्त्री की तरह। अब सवाल यह उठता है कि क्या डॉलर के मुकाबले रुपए की कमजोरी को बिल्कुल ही गंभीरता से न लिया जाए या फिर यह मान लिया जाए कि रुपया स्वयं टूट कर भारतीय निर्यातों को ताकत दे रहा है? क्या अब रुपए का आईसीयू में होना उतना ही खतरनाक नहीं है जितना कि पिछली सरकार या सरकारों में हुआ करता था?  

वित्तीय सलाहकार एजेंसियां दोतरफा अनुमान व्यक्त करती दिख रही हैं। एक तरफ वह कह रही हैं कि रुपए में मजबूती की बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं लगानी चाहिए लेकिन दूसरी तरफ वे यह कहती दिख रही हैं कि रुपए की यह कमजोरी देश की अर्थव्यवस्था के लिए फिलहाल कोई बड़ा खतरा पैदा करती हुई नहीं दिखती है। यहां किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यह ध्यान रखने की जरूरत है कि हम रुपए को एक आइसोलेटेड फिनामिना के तहत देखना चाहते हैं या फिर ग्लोबल फिनामिना के तहत? कुछ अर्थशास्त्री इसे आइसोलेटेड फिनामिना के तहत देख रहे हैं जबकि कुछ ग्लोबल फिनामिना के तहत, पर वास्तविकता यह है कि ये दोनों ही एक साथ रुपए पर लागू हो रहे हैं।  

रुपए की गिरावट के पीछे कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है बल्कि एक पूरा संकुल है जिसमें अमेरिकी नीतियों का प्रभाव और भारतीय गवर्नेस की कमजोरी दोनों ही शामिल हैं। हम एक-एक कर इन कारणों को समझने का प्रयास करते हैं। पहला कारण तो अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती हुई कीमतें हैं जिनके चलते भारत के आयात बिल तेजी से बढ़े और विभिन्न वस्तुओं के आयात के लिए देश के मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बढ़ गई। यह स्थिति यदि ऐसे ही बरकरार रही तो फिर आयात बिल निरंतर बढ़ता जाएगा और रुपया नीचे की ओर खिसकता जाएगा। 

अभी यह स्थिति और बिगड़ सकती है क्योंकि अमेरिकी प्रशासन ने भारत, चीन सहित सभी देशों को ईरान से कच्चे तेल का आयात 4 नवंबर तक बंद करने के लिए कहा है। ऐसा न करने पर उसने आर्थिक प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है। अब यदि भारत अमेरिकी प्रशासन के अनुसार चला तो उसके आयात बिल और बढ़ेंगे साथ ही डॉलर की मांग भी बढ़ेगी (क्योंकि ईरान के साथ कारोबार भारतीय मुद्रा एवं यूरो में होता है)। दूसरा कारण भारतीय निर्यात का लगभग स्थिर होना है। यदि पिछले 7-8 वर्षो के आंकड़े देखें तो निर्यातों में स्थिरता की स्थिति बनी हुई है। निर्यातों की इस स्थिति को देखते हुए नए निवेशों की आवक (डॉलर का इनफ्लो) कम हुई। चूंकि डॉलर में निवेश दुनिया में सबसे सुरक्षित माना जा रहा है इसलिए वैश्विक निवेशक इस समय बड़े पैमाने पर डॉलर खरीदते दिख रहे हैं। इसके फलस्वरूप डॉलर की कीमतें चढ़ती जा रही हैं।

कुछ प्रमुख पक्ष और हैं। पहला यह कि आजकल ग्लोबल ट्रेड वार की स्थितियां दिख रही हैं, भारत भी इसमें किसी न किसी रूप में शामिल हो ही चुका है। ऐसे में विदेशी निवेशक  भारतीय बाजार में निवेश में जोखिम लेने से भाग रहे हैं। इसका विकल्प है अमेरिकी सिक्योरिटीज (डॉलर) में निवेश। दूसरा यह कि अमेरिकी डॉलर में लगातार मजबूती आ रही है और अमेरिका के सॉवरिन बॉन्ड, जो 10 वर्षो में मैच्योर होते थे, 3 प्रतिशत चढ़ चुके हैं। ऐसे में विदेशी पोर्टफोलियो भारत में आने को तैयार तो नहीं ही है साथ ही जो भारत में पोर्टफोलियो निवेश था वह अब वापस जा रहा है।  

कुल मिलकार रुपए का गिरना इस दृष्टि से चिंताजनक नहीं है कि रुपया कमजोर हो रहा है बल्कि इस दृष्टि से बेहद चिंताजनक है कि अर्थव्यवस्था और गवर्नेस में कहीं ऐसी बीमारी मौजूद है जिसके चलते विदेशी पूंजी इनफ्लो अवरुद्घ हो गए हैं और आउटफ्लो तेज, जो सामाजिक से दृष्टि से छुआछूत की बीमारियों में होता है। इसलिए यह विषय गंभीर बन जाता है। 


Web Title: Rahees singh blog: Rupee depreciation of the economy
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